पंचांग के शब्द और उनके अर्थ

हमारे पंचांग पृष्ठों में आने वाले शब्द, हर एक कुछ सरल वाक्यों में। जहाँ परंपराएँ किसी शब्द का अलग-अलग उपयोग करती हैं, वहाँ बताया गया है कि कौन-सा उपयोग किसका है।

पूजादीप के लिए लिखा गया, और नीचे दिए गए स्रोतों से मिलाया गया।

दिन

पंचांग pañcāṅga

हिंदू कैलेंडर: किसी एक स्थान के लिए हर दिन की तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण।

नाम का अर्थ है “पाँच अंग”, और यही पाँच इसके अंग हैं। किसी दिन का पंचांग स्थान पर निर्भर है, क्योंकि सूर्योदय और सूर्यास्त हर शहर में अलग होते हैं।

देखें: शहर के अनुसार पंचांग और राहु काल

स्रोत: पंचांग
तिथि tithi

चंद्र दिवस: वह समय जिसमें चंद्रमा सूर्य से 12 अंश आगे निकलता है। चंद्र मास में 30 तिथियाँ होती हैं।

तिथि पूरी पृथ्वी के लिए एक ही क्षण पर शुरू और समाप्त होती है, इसलिए घड़ी का समय हर शहर में अलग होता है। यह लगभग 20 से 27 घंटे चलती है।

स्रोत: तिथि
उदय तिथि का नियम udaya tithi

दिन उस तिथि के नाम से जाना जाता है जो उसके सूर्योदय के समय चल रही हो, चाहे वह जल्दी समाप्त हो जाए।

कुछ पर्व दिन का कोई दूसरा समय देखते हैं, जैसे सूर्यास्त के बाद का प्रदोष या आधी रात का निशीथ। हर पर्व का पृष्ठ बताता है कि उसका नियम कौन-सा समय देखता है।

स्रोत: उदय तिथि का नियम
क्षय और वृद्धि तिथि kṣaya, vṛddhi

क्षय तिथि किसी सूर्योदय को नहीं छूती, इसलिए उसका कोई दिन नहीं होता। वृद्धि तिथि दो सूर्योदय छूती है, इसलिए उसके दो दिन होते हैं।

इसी कारण नवरात्रि जैसा पर्व आठ से दस दिन तक चल सकता है।

स्रोत: क्षय और वृद्धि तिथि
नक्षत्र nakṣatra

चंद्रमा के मार्ग पर आकाश के 27 बराबर भागों में से एक, हर भाग 13°20′ का, किसी तारा-समूह के नाम पर।

दिन का नक्षत्र वह भाग है जिसमें उस समय चंद्रमा होता है। बहुत से परिवार शिशु के नाम का पहला अक्षर जन्म के नक्षत्र से चुनते हैं।

देखें: नक्षत्र से नाम के अक्षर (नामाक्षर)

स्रोत: नक्षत्र
योग और करण yoga, karaṇa

पंचांग के दो और अंग। करण आधी तिथि है। योग सूर्य और चंद्रमा के भोगांश को जोड़कर गिना जाता है।

योग 27 हैं, हर एक जोड़े गए भोगांश का 13°20′। भद्रा उस करण का नाम है जिसे विष्टि कहते हैं। कुछ विधियाँ, जैसे रक्षा बंधन पर राखी बाँधना, भद्रा में नहीं की जातीं।

देखें: रक्षा बंधन

स्रोत: योग और करण

मास और वर्ष

पक्ष: शुक्ल और कृष्ण śukla pakṣa, kṛṣṇa pakṣa

चंद्र मास का आधा भाग। शुक्ल पक्ष में चंद्रमा बढ़ता है, कृष्ण पक्ष में घटता है।

यहाँ कृष्ण का अर्थ है अँधेरा। “कृष्ण एकादशी” का अर्थ है कृष्ण पक्ष की एकादशी, भगवान कृष्ण के नाम का दिन नहीं। सुदी और बदी (या वदी) इन दोनों पक्षों के दूसरे नाम हैं।

स्रोत: पक्ष: शुक्ल और कृष्ण
पूर्णिमा और अमावस्या pūrṇimā, amāvāsyā

पूर्णिमा पूरे चाँद की तिथि है, शुक्ल पक्ष की अंतिम। अमावस्या नए चाँद की तिथि है, कृष्ण पक्ष की अंतिम।

देखें: पूर्णिमा व्रत, अमावस्या

स्रोत: पूर्णिमा और अमावस्या
एकादशी ekādaśī

हर पक्ष की ग्यारहवीं तिथि, बहुत से परिवारों के लिए व्रत का दिन। दशमी दसवीं और द्वादशी बारहवीं तिथि है।

साल की हर एकादशी का अपना नाम और अपनी कथा है।

देखें: एकादशी की तिथियाँ और पारण का समय

स्रोत: एकादशी
अमांत और पूर्णिमांत amānta, pūrṇimānta

मासों के नाम रखने के दो ढंग। अमांत मास अमावस्या पर समाप्त होता है, पूर्णिमांत मास पूर्णिमा पर।

इसलिए दोनों पद्धतियाँ कृष्ण पक्ष को अलग-अलग मास का नाम देती हैं। पर्व का दिन दोनों में एक ही रहता है। हमारे पृष्ठ दोनों मासों के नाम दिखाते हैं।

स्रोत: अमांत और पूर्णिमांत
अधिक मास adhikamāsa

एक अतिरिक्त चंद्र मास, जो लगभग हर 32 या 33 महीने में जुड़ता है, ताकि मास ऋतुओं के साथ चलते रहें।

यह तब आता है जब सूर्य के एक ही राशि में रहते दो अमावस्याएँ पड़ें, और इसका नाम अगले मास वाला ही होता है। वार्षिक पर्व इसमें नहीं मनाए जाते; मासिक व्रत रखे जाते हैं।

स्रोत: अधिक मास
संवत: विक्रम और शक vikrama saṃvat, śaka saṃvat

वर्षों की गिनती। विक्रम संवत ईसवी सन से 56 या 57 वर्ष आगे है, और शक संवत 78 या 79 वर्ष पीछे।

उत्तर भारत में विक्रम वर्ष चैत्र से शुरू होता है (चैत्रादि)। गुजरात में यह कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा (बेसतुं वरस) को, दिवाली के बाद, शुरू होता है (कार्तिकादि), इसलिए वर्ष के कुछ भाग में दोनों गिनतियों में एक का अंतर रहता है। हमारे पृष्ठ दोनों देते हैं।

स्रोत: संवत: विक्रम और शक
संक्रांति saṃkrānti

वह क्षण जब सूर्य नई राशि में प्रवेश करता है। सौर मास, जैसे तमिल मास, संक्रांति से आरंभ होते हैं।

राशियाँ तारों के सापेक्ष गिनी जाती हैं (निरयन राशिचक्र)। मकर संक्रांति सूर्य का मकर राशि में प्रवेश है।

देखें: मकर संक्रांति

स्रोत: संक्रांति
तमिल मास

तमिल पंचांग का सौर मास। यह तब आरंभ होता है जब सूर्य नई राशि में प्रवेश करता है।

तमिल मास बारह हैं, हर राशि का एक: चित्तिरै (सूर्य मेष में), वैकासि, आनि, आडि, आवणि, पुरट्टासि, ऐप्पसि, कार्तिगै, मार्गऴि, तै, मासि और पंगुनि (सूर्य मीन में)। सूर्य सूर्यास्त से पहले राशि में प्रवेश करे, तो मास उसी दिन आरंभ होता है; सूर्यास्त के बाद करे, तो अगले दिन। पूजादीप का हर दिन का पंचांग तमिल मास और उसका दिन चंद्र मास के साथ दिखाता है। बहुत-से तमिल मंदिर वाक्य पंचांगम् मानते हैं, और उनका मास एक दिन पहले या बाद में आरंभ हो सकता है।

देखें: शहर के अनुसार पंचांग और राहु काल

स्रोत: तमिल मास

दिन और रात के समय

घटी (घटिका) ghaṭikā

समय की पुरानी इकाई: 24 मिनट। साठ घटी का एक दिन-रात होता है।

पुराने ग्रंथों के नियम समय घटियों में देते हैं। जब दिन और रात दोनों 12-12 घंटे के हों, तब दो घटी का एक मुहूर्त होता है।

स्रोत: घटी (घटिका)
मुहूर्त muhūrta

वह समय जिसे छपा हुआ नियम किसी विधि के लिए मान्य मानता है। इकाई के रूप में दिन या रात का पंद्रहवाँ भाग: लगभग 48 मिनट।

दिन और रात, दोनों में 15-15 मुहूर्त होते हैं, इसलिए गर्मियों के लंबे दिन में दिन का मुहूर्त भी लंबा होता है।

देखें: शुभ मुहूर्त: संस्कारों के समय, शहर के अनुसार

स्रोत: मुहूर्त
  • पूजादीप पंचांग: दिन और रात के समय-खंड (दिन के पाँच भाग, दिन और रात के 15-15 मुहूर्त, अभिजित, प्रदोष, निशीथ, अरुणोदय, और राहु काल, यमगण्ड और गुलिक काल की तालिकाएँ), हर खंड के दिए स्रोतों सहित
अभिजित मुहूर्त abhijit

दिन के 15 मुहूर्तों में आठवाँ, जो स्थानीय दोपहर के आसपास आता है। कई पंचांग बुधवार को अभिजित मुहूर्त नहीं मानते।

स्रोत: अभिजित मुहूर्त
  • पूजादीप पंचांग: दिन और रात के समय-खंड (दिन के पाँच भाग, दिन और रात के 15-15 मुहूर्त, अभिजित, प्रदोष, निशीथ, अरुणोदय, और राहु काल, यमगण्ड और गुलिक काल की तालिकाएँ), हर खंड के दिए स्रोतों सहित
प्रातःकाल, मध्याह्न और अपराह्न prātaḥkāla, madhyāhna, aparāhṇa

दिन के पाँच बराबर भागों में से तीन: सुबह, दोपहर और दोपहर के बाद का समय। पारण और कुछ पर्वों के नियम इन्हें देखते हैं।

पाँचों भाग क्रम से हैं: प्रातःकाल, संगव (पूर्वाह्न), मध्याह्न, अपराह्न और सायाह्न। हर भाग सूर्योदय से सूर्यास्त तक के समय का पाँचवाँ हिस्सा है।

स्रोत: प्रातःकाल, मध्याह्न और अपराह्न
प्रदोष (प्रदोष काल) pradoṣa

सूर्यास्त के बाद का संध्या-समय: रात का पहला पाँचवाँ भाग, यानी 12 घंटे की रात में लगभग 2 घंटे 24 मिनट।

पुराने ग्रंथ इसे सूर्यास्त के बाद के तीन मुहूर्त, या छह घटी, बताते हैं। लक्ष्मी पूजा जैसी संध्या की पूजाएँ इसी समय होती हैं। प्रदोष व्रत उस त्रयोदशी को रखा जाता है जिसमें यह समय पड़ता है।

देखें: प्रदोष व्रत (प्रदोषम्)

स्रोत: प्रदोष (प्रदोष काल)
निशीथ niśītha

रात का मध्य भाग: रात के 15 मुहूर्तों में आठवाँ, सूर्यास्त और सूर्योदय के ठीक बीच के आसपास।

जन्माष्टमी और शिवरात्रि जैसे रात के पर्व इसी समय को देखते हैं। कुछ पुराने ग्रंथ इसे रात के बीच की दो घटी बताते हैं।

स्रोत: निशीथ
अरुणोदय aruṇodaya

सूर्योदय से पहले की भोर। वैष्णव एकादशी के नियम में सूर्योदय से पहले के 96 मिनट (चार घटी)।

यदि अरुणोदय के समय दशमी चल रही हो, तो वैष्णव नियम व्रत को आगे के दिन पर ले जाता है।

देखें: एकादशी की तिथियाँ और पारण का समय

स्रोत: अरुणोदय
राहु काल rāhukāla

दिन के आठ बराबर भागों में से एक, जो वार से तय होता है।

राहु काल पंचांग का एक हिस्सा है, जो सूर्योदय और सूर्यास्त से निकाला जाता है। बहुत से परिवार इस समय नया काम शुरू नहीं करते। यह भविष्यवाणी नहीं है, और पूजादीप कोई भविष्यवाणी नहीं करता। यमगण्ड और गुलिक काल दो और भाग हैं, जो वार की दूसरी तालिकाओं से आते हैं।

देखें: दिल्ली में आज का राहु काल, शहर के अनुसार पंचांग और राहु काल

स्रोत: राहु काल
  • पूजादीप पंचांग: दिन और रात के समय-खंड (दिन के पाँच भाग, दिन और रात के 15-15 मुहूर्त, अभिजित, प्रदोष, निशीथ, अरुणोदय, और राहु काल, यमगण्ड और गुलिक काल की तालिकाएँ), हर खंड के दिए स्रोतों सहित
चौघड़िया

दिन और रात, दोनों आठ-आठ बराबर भागों में बँटे हुए, और हर भाग का एक पारंपरिक नाम।

हर भाग सात नामों में से एक लेता है: उद्वेग, चर, लाभ, अमृत, काल, शुभ और रोग। ये नाम परंपरा के दिए हुए हैं। चौघड़िया पंचांग का तथ्य है, भविष्यवाणी नहीं।

देखें: दिल्ली में आज का चौघड़िया

स्रोत: चौघड़िया

व्रत और उनके नियम

व्रत vrata

किसी तय दिन रखा गया संकल्प, प्रायः उपवास और पूजा के साथ।

हर व्रत के दिन का अपना नियम होता है, और बहुत से व्रतों में व्रत खोलने (पारण) का समय तय होता है।

देखें: हिंदू व्रत (उपवास) क्यों रखते हैं? व्रत क्या है?, मासिक व्रत और उनकी तिथियाँ

स्रोत: व्रत
पारण pāraṇa

व्रत को उसके नियम के बताए समय में खोलना। एकादशी का पारण: अगले दिन, सूर्योदय और हरि वासर के बाद, द्वादशी समाप्त होने से पहले।

स्मार्त नियम प्रातःकाल (दिन का पहला पाँचवाँ भाग) को पहले रखता है और मध्याह्न से बचता है।

देखें: एकादशी की तिथियाँ और पारण का समय

स्रोत: पारण
हरि वासर harivāsara

द्वादशी तिथि का पहला चौथाई भाग। एकादशी का पारण इसमें नहीं होता।

देखें: एकादशी की तिथियाँ और पारण का समय

स्रोत: हरि वासर
स्मार्त नियम और वैष्णव नियम smārta, vaiṣṇava

पर्व या व्रत का दिन तय करने के दो परंपराओं के नियम। ये अलग दिन दें, तो हमारे पृष्ठ दोनों दिन दिखाते हैं और नियम का नाम देते हैं।

स्मार्त नियम स्मार्त परंपरा का नियम है, और पूजादीप में यही पहले दिखता है। एकादशी के लिए यह सूर्योदय के समय की तिथि देखता है। वैष्णव नियम वैष्णव पंचांगों का है; हम गौड़ीय वैष्णव पद्धति लेते हैं। एकादशी के लिए यह सूर्योदय से लगभग 96 मिनट पहले का अरुणोदय देखता है, इसलिए इसका व्रत कभी-कभी एक दिन बाद पड़ता है। जो परिवार जिसे मानते हैं, उनके लिए दोनों सही हैं।

देखें: एकादशी की तिथियाँ और पारण का समय

स्रोत: स्मार्त नियम और वैष्णव नियम

स्रोत

और

स्रोत और लाइसेंस

हमारी व्याख्या
इस साइट के लिए यहाँ दिए स्रोतों के आधार पर लिखा गया, और उन्हीं से मिलाया गया। श्रेय देकर आप इसे उद्धृत कर सकते हैं।
जाँच
दिए गए स्रोतों से मिलाया गया, 28 अक्टूबर 2026।

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