कान्हा के मुँह में सारा संसार
3-6 वर्ष की आयु
बच्चे यशोदा मैया से कहते हैं कि कान्हा ने मिट्टी खाई है। मैया उनका मुँह खुलवाती हैं तो उसमें पूरा संसार दिखता है, और फिर सब भूलकर वे अपने लल्ला को गले से लगा लेती हैं।
पूजादीप के लिए लिखा गया, और नीचे दिए गए स्रोतों से मिलाया गया।
कहानी
एक दिन कान्हा अपने बड़े भैया बलराम और गोकुल के दूसरे बच्चों के साथ खेल रहे थे। थोड़ी देर में सारे बच्चे दौड़ते हुए यशोदा मैया के पास आए और बोले, “मैया, कान्हा ने मिट्टी खाई है!”
मैया ने कान्हा का हाथ पकड़ा और पूछा, “क्यों रे लल्ला, तूने मिट्टी खाई? तेरे सारे सखा कह रहे हैं, और तेरे भैया भी।”
कान्हा ने भोलेपन से सिर हिलाया, “नहीं मैया, मैंने मिट्टी नहीं खाई। ये सब झूठ-मूठ कह रहे हैं। चाहो तो मेरा मुँह देख लो।”
“अच्छा, तो मुँह खोलो,” मैया बोलीं। कान्हा ने अपना छोटा-सा मुँह खोल दिया।
मैया ने झाँककर देखा, तो मिट्टी कहीं नहीं थी। वहाँ तो पूरा आकाश था! सूरज, चाँद और तारे थे। पहाड़, नदियाँ और समुद्र थे। हवा थी, आग थी, धरती थी और उसके सारे देश थे। उसी में गोकुल भी था, और गोकुल में खड़ी खुद यशोदा मैया भी।
मैया ने पलकें झपकाईं। मन में सोचा, “क्या यह सपना है? या मेरा लल्ला कोई बहुत बड़ा है?” उन्होंने हाथ जोड़े और उस प्रभु को प्रणाम किया, जो सारे संसार को अपने भीतर रखता है।
फिर उनके मन में ममता की एक कोमल, गरम लहर उठी। जो देखा था, वह सब भूल गईं। अब उन्हें बस अपना नन्हा कान्हा दिखाई दिया। उन्होंने उसे उठाकर गोद में बिठा लिया और पहले की तरह ही लाड़ करने लगीं।
बहुत से परिवार इस कथा से यह भाव लेते हैं कि जो सारे संसार को थामे है, वही बच्चा बनकर माँ की गोद में थमने आया।
साथ मिलकर करने के लिए
बाहर चटाई बिछाकर लेट जाइए, या खिड़की से साथ मिलकर देखिए, और जो-जो दिखे उसका नाम लीजिए: आकाश, बादल, पेड़, चिड़ियाँ, घर। फिर एक-दूसरे से पूछिए कि यशोदा मैया को कान्हा के मुँह में और क्या-क्या दिखा होगा।
और कहानियाँ
बड़ों के लिए
कहानी ऊपर पूरी हुई। यहाँ बड़ों के लिए: परिवार इसे किन दूसरे ढंगों से सुनाते हैं, और यह किन ग्रंथों से ली गई है।
कहानी में क्या अंतर मिलता है, और यह कहाँ से आई
कहानी में क्या अंतर मिलता है
भागवत में ऐसे दो प्रसंग आते हैं। एक में नन्हे कान्हा मैया की गोद में दूध पीते-पीते जम्हाई लेते हैं, और मैया को उनके मुँह में सारा संसार दिखता है (दशम स्कंध, अध्याय 7)। दूसरे में, जो यहाँ सुनाया गया है, वे यह दिखाने के लिए मुँह खोलते हैं कि उन्होंने मिट्टी नहीं खाई (दशम स्कंध, अध्याय 8)। बहुत सी कहानियों में ये दोनों प्रसंग एक में मिल जाते हैं। मथुरा के पास ब्रज में श्रद्धालु महावन में यमुना किनारे ब्रह्मांड घाट जाते हैं, जहाँ स्थानीय परंपरा इस कथा को मानती है; ब्रह्मांड का अर्थ है पूरा संसार।
कहानी कहाँ से आई
- श्रीमद्भागवत, स्कंध 10, अध्याय 8: 10.8.32–45 बच्चे कहते हैं कि कृष्ण ने मिट्टी खाई; यशोदा उनके मुँह में सारा ब्रह्मांड देखती हैं
- श्रीमद्भागवत, स्कंध 10, अध्याय 8, श्लोक 32–45, ओवेत-बेनो का फ़्रांसीसी अनुवाद (पेरिस, 1884), पृष्ठ 42–44
- श्रीमद्भागवत, स्कंध 10, अध्याय 8, मन्मथ नाथ दत्त का अंग्रेज़ी अनुवाद (कलकत्ता, 1895–96), पृष्ठ 40; प्रसंग का बाकी भाग, पृष्ठ 41, इस स्कैन में नहीं है
स्रोत
- श्रीमद्भागवत, स्कंध 10, अध्याय 8, ओवेत-बेनो का फ़्रांसीसी अनुवाद (1884), पृष्ठ 42–44
- श्रीमद्भागवत, स्कंध 10, मन्मथ नाथ दत्त का अंग्रेज़ी अनुवाद (1895–96): अध्याय 7, पृष्ठ 36, जम्हाई का प्रसंग; अध्याय 8, पृष्ठ 40
- एफ़. एस. ग्राउज़, मथुरा ज़िले पर अंग्रेज़ी पुस्तक (तीसरा संस्करण, 1883), महावन के इक्कीस तीर्थ, पृष्ठ 280: ब्रह्मांड घाट और यात्रियों के रेत के 'पेड़े', जो कृष्ण के मुँह में धरती की याद दिलाते हैं (क्षेत्रीय टिप्पणी)
स्रोत और लाइसेंस
- हमारी व्याख्या
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- जाँच
- दिए गए स्रोतों से मिलाया गया, 15 अक्टूबर 2026।