हनुमान ने सीता माता को खोजा
7-10 वर्ष की आयु
हनुमान जी समुद्र लाँघकर लंका पहुँचते हैं, चाँदनी रात में नगर छान मारते हैं और अशोक वाटिका में सीता माता को पाते हैं। वे उन्हें श्रीराम की अँगूठी देते हैं, उनकी चूड़ामणि श्रीराम तक लाते हैं, और वह बात सुनाते हैं जिसकी सबको प्रतीक्षा थी: “मैंने सीता माता को देखा है।”
पूजादीप के लिए लिखा गया, और नीचे दिए गए स्रोतों से मिलाया गया।
कहानी
लंका का दस सिर वाला राजा रावण सीता माता को हरकर समुद्र पार ले गया था। श्रीराम और उनके भाई लक्ष्मण ने उन्हें हर जगह ढूँढा था। अब राजा सुग्रीव की वानर सेना उनकी मदद कर रही थी, और उन सबमें सबसे वीर थे हनुमान जी।
समुद्र किनारे के एक पर्वत पर खड़े होकर हनुमान जी ने सूर्य देव को, अपने पिता पवन देव को, इंद्र को और ब्रह्मा जी को प्रणाम किया। बोले, “श्रीराम के बाण की तरह तेज़ मैं लंका जाऊँगा।” फिर वे झुके, और छलाँग लगा दी। उनकी छलाँग के ज़ोर से पेड़ उखड़कर उनके पीछे-पीछे खिंचे चले आए, और उनके फूल बारिश की तरह लहरों पर बरस पड़े।
आधे रास्ते में समुद्र से एक सुनहरा पर्वत ऊपर उठ आया। वह मैनाक पर्वत था। बोला, “श्रीराम के मित्र, मेरी चोटी पर थोड़ा विश्राम कर लो, मेरे मीठे फल खा लो।” हनुमान जी ने पर्वत को धन्यवाद दिया, हाथ से उसे छुआ, और आगे उड़ चले। सीता माता को पाए बिना उन्हें विश्राम कहाँ!
सूरज ढलते-ढलते वे लंका के किनारे उतरे। नगर सोने के महलों और जगमगाते दीयों से चमक रहा था। चुपके से भीतर जाने के लिए हनुमान जी ने अपना रूप बिल्ली जितना छोटा कर लिया। सारी रात, चाँदनी में, वे एक महल से दूसरे महल तक घूमते रहे। सोते हुए पहरेदार दिखे, रावण का बड़ा दरबार दिखा, पर सीता माता कहीं नहीं दिखीं।
हनुमान जी का मन निराश होने लगा। तभी उन्हें याद आया कि एक जगह तो देखी ही नहीं, अशोक के पेड़ों वाली वाटिका। वे एक ऊँचे शिंशपा के पेड़ पर चढ़ गए और पत्तों के बीच से नीचे झाँका। वहाँ ज़मीन पर, मैले पीले वस्त्र में, दुबली और उदास, एक चोटी बाँधे एक देवी बैठी थीं। वही सीता माता थीं।
उनके चारों ओर पहरेदारिनें खड़ी थीं। सुबह रावण आया और बोला, “राम को भूल जाओ और मेरी रानी बन जाओ।” सीता माता ने मुँह फेर लिया। बोलीं, “श्रीराम मेरे पति हैं, और वे मुझे लेने अवश्य आएँगे।” रावण गुस्से में पैर पटकता चला गया, और पहरेदारिनें फिर से पहरा देने लगीं।
हनुमान जी नहीं चाहते थे कि अचानक नीचे कूदकर सीता माता को डरा दें। इसलिए उन्होंने सीधी-सादी बोलचाल की भाषा चुनी, ताकि वे इसे रावण की कोई चाल न समझें, और पेड़ पर बैठे-बैठे धीरे-धीरे श्रीराम की कथा सुनाने लगे: कैसे राजा दशरथ के बेटे वन गए, कैसे सीता माता को हर लिया गया, कैसे श्रीराम ने उन्हें ढूँढा और वानरों से मित्रता की, और कैसे हनुमान समुद्र लाँघकर आए। सीता माता ने अचरज से ऊपर देखा।
हनुमान जी नीचे उतरे और प्रणाम किया। पहले तो सीता माता को लगा कि कहीं यह भी कोई छल तो नहीं। तब हनुमान जी ने सोने की एक अँगूठी आगे बढ़ाई, जिस पर श्रीराम का नाम खुदा था। सीता माता ने अँगूठी ऐसे थाम ली जैसे श्रीराम का हाथ थाम रही हों। उनकी आँखों से खुशी के आँसू बहने लगे।
“मेरी पीठ पर बैठ जाइए, माता,” हनुमान जी बोले। “मैं अभी आपको समुद्र पार श्रीराम के पास ले चलता हूँ।” पर सीता माता ने सिर हिलाया। बोलीं, “श्रीराम स्वयं आकर मुझे ले जाएँ, यही ठीक है।” फिर उन्होंने अपने बालों से चूड़ामणि निकालकर हनुमान जी को दी, और चित्रकूट के एक कौए की वह बात भी बताई जो सिर्फ़ श्रीराम जानते थे, ताकि उन्हें पक्का भरोसा हो जाए कि संदेश उन्हीं का है।
लौटने से पहले हनुमान जी चाहते थे कि रावण को भी पता चले कि श्रीराम के साथी लंका तक पहुँच गए हैं। उन्होंने वाटिका के पेड़ झकझोर डाले, और पहरेदार दौड़े चले आए। रावण के योद्धा उन पर टूट पड़े, पर हनुमान जी ने सबको तितर-बितर कर दिया। आख़िर रावण के बेटे इंद्रजीत ने एक मायावी अस्त्र से उन्हें बाँध लिया और राजा के सामने ले गया।
रावण आगबबूला हो गया। बोला, “इसकी पूँछ में आग लगा दो!” उसके सेवकों ने हनुमान जी की पूँछ पर तेल में भीगे कपड़े लपेटे और आग लगा दी। सीता माता ने यह सुना तो अग्नि देव से प्रार्थना की, “यदि मैं सदा सच्ची रही हूँ, तो हनुमान के लिए शीतल हो जाओ।” लपटें ऊँची उठीं, पर हनुमान जी को ज़रा भी आँच नहीं लगी।
हनुमान जी ने अपना रूप छोटा किया, रस्सियों से निकल गए और मशाल की तरह जलती पूँछ लिए छतों पर कूद पड़े। एक छत से दूसरी छत पर दौड़ते गए, और पीछे-पीछे लंका के सोने के घरों में आग लगती गई। बस रावण के भले भाई विभीषण का घर बचा रहा। फिर हनुमान जी अचानक रुक गए। “कहीं आग सीता माता तक तो नहीं पहुँची?” वे भागकर अशोक वाटिका गए, और देखा कि सीता माता बिल्कुल सकुशल हैं। उन्होंने एक बार फिर माता को प्रणाम किया, समुद्र में पूँछ बुझाई, और घर की ओर छलाँग लगा दी।
उस पार वानर राह देख रहे थे। हनुमान जी का खिला हुआ चेहरा देखते ही वे उछलने-कूदने और जयकारे लगाने लगे। सब मिलकर श्रीराम के पास पहुँचे, और हनुमान जी ने चूड़ामणि उनके हाथ में रख दी। बोले, “मैंने सीता माता को देखा है।” श्रीराम ने चूड़ामणि को अपने हृदय से लगा लिया। रामायण का यह भाग पढ़ने वाले बहुत से परिवार इससे यह भाव लेते हैं कि जो मित्र कभी हार नहीं मानता, वह समुद्र पार भी आशा पहुँचा देता है।
साथ मिलकर करने के लिए
खोजो-और-पहुँचाओ खेल खेलिए। एक व्यक्ति घर में कहीं कोई छोटा खिलौना “सीता माता” बनाकर छिपा दे। दूसरा कमरा-कमरा देखकर उसे ढूँढे, और सबूत के तौर पर कोई निशानी वापस लाए, जैसे कागज़ की अँगूठी जिस पर किसी प्रिय का नाम लिखा हो।
और कहानियाँ
बड़ों के लिए
कहानी ऊपर पूरी हुई। यहाँ बड़ों के लिए: परिवार इसे किन दूसरे ढंगों से सुनाते हैं, और यह किन ग्रंथों से ली गई है।
कहानी में क्या अंतर मिलता है, और यह कहाँ से आई
कहानी में क्या अंतर मिलता है
उत्तर भारत में तुलसीदास जी का रामचरितमानस सबसे जाना-माना रूप है। उसका सुंदरकांड, उसके सात कांडों में पाँचवाँ, यही यात्रा अवधी चौपाइयों में सुनाता है। वहाँ हनुमान जी सीता माता से मिलने से पहले लंका में विभीषण से मिलते हैं।
कहानी कहाँ से आई
- वाल्मीकि रामायण, सुंदरकांड, ग्रिफ़िथ की गिनती में सर्ग 1–66: छलाँग और मैनाक पर्वत (1); रात में लंका और अशोक वाटिका (2–14); हनुमान का सीता से बोलना, अँगूठी, मणि और कौए की कथा (30–38); जलती पूँछ, सीता की अग्नि से प्रार्थना और सीता के लिए चिंता (53–55); समाचार और राम के वचन (65–66)
- वाल्मीकि रामायण, सुंदरकांड, ग्रिफ़िथ का अंग्रेज़ी पद्यानुवाद, खंड 4 (लंदन, 1873): सर्ग 1, पृष्ठ 279–288; सर्ग 30–38, पृष्ठ 348–370; सर्ग 53–55, पृष्ठ 396–402; सर्ग 65–66, पृष्ठ 410–413
स्रोत
- वाल्मीकि रामायण, सुंदरकांड, सर्ग 1–66, ग्रिफ़िथ का अंग्रेज़ी पद्यानुवाद, खंड 4 (1873), पृष्ठ 279–413
स्रोत और लाइसेंस
- हमारी व्याख्या
- इस साइट के लिए यहाँ दिए स्रोतों के आधार पर लिखा गया, और उन्हीं से मिलाया गया। श्रेय देकर आप इसे उद्धृत कर सकते हैं।
- जाँच
- दिए गए स्रोतों से मिलाया गया, 16 अक्टूबर 2026।
- अद्यतन
- 27 अक्टूबर 2026