सूरज की ओर हनुमान की छलाँग
7-10 वर्ष की आयु
समुद्र के किनारे बूढ़े जाम्बवान हनुमान को उनका बचपन याद दिलाते हैं: कैसे भूखे नन्हे हनुमान उगते सूरज को फल समझकर आकाश में कूद पड़े थे, और कैसे पवन देव के इस बेटे को उसका नाम मिला। अपनी शक्ति याद आते ही हनुमान समुद्र लाँघने के लिए उठ खड़े होते हैं।
पूजादीप के लिए लिखा गया, और नीचे दिए गए स्रोतों से मिलाया गया।
कहानी
वानरों की पूरी सेना दक्षिण के महासागर के किनारे बैठी थी। उस पार, लंका नगरी में, सीता माता श्रीराम की राह देख रही थीं। पर समुद्र सौ योजन चौड़ा था। योजन लंबी दूरी की एक पुरानी नाप है, यानी समुद्र बहुत-बहुत चौड़ा था, और किसी को समझ नहीं आ रहा था कि उसे पार कैसे करें। एक-एक करके सबने बताया कि कौन कितनी दूर कूद सकता है, पर इतनी दूर कोई नहीं कूद सकता था। हनुमान जी चुपचाप एक ओर बैठे थे।
तब भालुओं के बूढ़े और समझदार राजा जाम्बवान उनके पास आकर बैठे। बोले, “हनुमान, ऐसे चुप क्यों बैठे हो? तुम सुग्रीव जितने बलवान हो और स्वयं श्रीराम जितने वीर। क्या भूल गए कि तुम कौन हो? सुनो, तुम्हें एक कहानी सुनाता हूँ।”
जाम्बवान बताने लगे: बहुत पहले अंजना नाम की एक सुंदर वानरी थीं, जो वानरों के सरदार केसरी की पत्नी थीं। पवन देव ने उन्हें आशीर्वाद दिया कि उनका बेटा हवा जैसा बलवान और हवा जैसा तेज़ होगा। वही बेटा थे हनुमान।
एक सुबह नन्हे हनुमान भूखे जागे। माँ फल लाने वन में गई हुई थीं। उन्होंने ऊपर देखा तो पेड़ों के ऊपर उगता हुआ सूरज दिखा, गोल, लाल और दमकता हुआ। उन्होंने सोचा, “अरे, कितना बड़ा पका हुआ फल है!” और वे उछल पड़े।
ऊपर, और ऊपर, और ऊपर वे उड़ते गए। देवता और आकाश में रहने वाले सब अचरज से देखते रह गए। बोले, “इतनी तेज़ तो हवा भी नहीं चलती! बचपन में यह हाल है, तो बड़े होकर यह कितना बलवान होगा?” पवन देव अपने बेटे के साथ-साथ उड़ते रहे और उस पर ठंडी हवा करते रहे, ताकि सूरज की गर्मी उसे न झुलसाए। सूर्य देव ने भी देखा कि यह तो एक नन्हा बच्चा है, और उन्होंने भी उसे नहीं जलाया।
पर देवताओं के राजा इंद्र ने देखा कि एक बच्चा आकाश में सूरज की ओर दौड़ा चला जा रहा है। वे अपने बड़े सफ़ेद हाथी ऐरावत पर बैठकर निकले। हनुमान ने हाथी को देखा तो सोचा, “यह तो और भी बड़ा फल है!” और उसकी ओर भी हाथ बढ़ा दिया।
उसे रोकने के लिए इंद्र ने अपना वज्र चला दिया। वज्र नन्हे हनुमान की ठोड़ी पर लगा, और वे लुढ़कते हुए वापस धरती पर आ गिरे।
पवन देव ने अपने बेटे को गोद में उठाया और एक गुफा में ले गए। वे इतने दुखी और नाराज़ थे कि उन्होंने बहना ही बंद कर दिया। हर जगह हवा थम गई। पत्ते सरसराना भूल गए, झंडे लहराना भूल गए। मनुष्यों और जानवरों को साँस लेने में कठिनाई होने लगी, और सारा संसार भारी और सुनसान-सा हो गया।
देवता भागे-भागे सृष्टि रचने वाले ब्रह्मा जी के पास पहुँचे। ब्रह्मा जी सबको उस गुफा में ले गए, जहाँ पवन देव हनुमान को गोद में लिए बैठे थे। ब्रह्मा जी ने बालक को वरदान दिया कि युद्ध में कोई भी अस्त्र उसे मार नहीं सकेगा। इंद्र ने वचन दिया कि उनका वज्र फिर कभी हनुमान को चोट नहीं पहुँचाएगा।
पवन देव का मन शांत हुआ। वे फिर से बहने लगे, और सारे संसार ने चैन की साँस ली। उसी दिन से उस बालक का नाम पड़ा हनुमान। संस्कृत में “हनु” का अर्थ है ठोड़ी या जबड़ा, और यह नाम उसी दिन की याद दिलाता है जब वज्र उनकी ठोड़ी पर लगा था।
“वह बालक तुम ही थे,” जाम्बवान बोले। “तुम पवनपुत्र हो। तुम यह समुद्र लाँघ सकते हो। उठो, हनुमान!”
हनुमान जी उठ खड़े हुए। जैसे-जैसे उन्हें सब याद आता गया, वे बढ़ते गए, बढ़ते गए, यहाँ तक कि खुशी से जयकारे लगाते वानरों के बीच वे एक पहाड़ जितने ऊँचे हो गए। उन्होंने समुद्र के उस पार लंका की ओर देखा, अपने जीवन की सबसे बड़ी छलाँग के लिए तैयार। बहुत से परिवार इस कथा से यह भाव लेते हैं कि कभी-कभी हमें अपनी ही शक्ति याद दिलाने के लिए किसी अपने की ज़रूरत होती है।
साथ मिलकर करने के लिए
घेरा बनाकर बैठिए और बारी-बारी से परिवार के हर सदस्य की एक खूबी बताइए, जैसे जाम्बवान ने हनुमान को उनकी शक्ति याद दिलाई थी। फिर सुबह बाहर जाकर हनुमान वाली छलाँग लगाइए: नीचे झुकिए और उगते सूरज की ओर जितना ऊँचा हो सके कूदिए, पर सूरज की ओर सीधे कभी मत देखिए।
हनुमान जयंती: जिस पर्व से यह कहानी जुड़ी है
और कहानियाँ
बड़ों के लिए
कहानी ऊपर पूरी हुई। यहाँ बड़ों के लिए: परिवार इसे किन दूसरे ढंगों से सुनाते हैं, और यह किन ग्रंथों से ली गई है।
कहानी में क्या अंतर मिलता है, और यह कहाँ से आई
कहानी में क्या अंतर मिलता है
वाल्मीकि रामायण में यह कथा दो बार आती है। किष्किंधा कांड में जाम्बवान इसे समुद्र के किनारे सुनाते हैं। उत्तर कांड में अगस्त्य मुनि इसे श्रीराम को और विस्तार से सुनाते हैं, और बताते हैं कि नटखट बालक हनुमान को ऋषियों ने शाप दिया था कि जब तक कोई याद न दिलाए, उन्हें अपनी पूरी शक्ति का पता नहीं रहेगा। हनुमान चालीसा कहती है कि उन्होंने सूरज को मीठा फल जानकर निगल लिया था। अलग-अलग क्षेत्रों में हनुमान जयंती अलग-अलग दिनों पर मनाई जाती है: उत्तर भारत में चैत्र पूर्णिमा को, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के तेलुगु परिवारों में वैशाख में, कर्नाटक में मार्गशीर्ष में, तमिलनाडु और केरल में मार्गऴि मास में, और ओडिशा में पणा संक्रांति को।
कहानी कहाँ से आई
- वाल्मीकि रामायण, किष्किंधा कांड, ग्रिफ़िथ की गिनती में सर्ग 66: जाम्बवान हनुमान को उनका जन्म, सूर्य की ओर उनकी छलाँग, इंद्र का वज्र, पवन देव का दुख, और ब्रह्मा और इंद्र के वरदान बताते हैं; हनुमान विशाल हो जाते हैं (सर्ग 67)
- वाल्मीकि रामायण, किष्किंधा कांड, सर्ग 66–67, ग्रिफ़िथ का अंग्रेज़ी पद्यानुवाद, खंड 4 (लंदन, 1873), पृष्ठ 271–275
- वाल्मीकि रामायण, उत्तरकांड: अगस्त्य राम को हनुमान का बचपन सुनाते हैं; दत्त की छपाई में अध्याय 40 (कई दूसरी छपाइयों में उत्तरकांड के अध्याय 35 और 36): माँ फल लेने गई हैं, पवन बच्चे को ठंडक देते हैं, सूर्य उसे नहीं जलाते, ऐरावत को फल समझना, और पवन का एक गुफा में चले जाना
- वाल्मीकि रामायण, उत्तरकांड, अध्याय 40, मन्मथ नाथ दत्त का अंग्रेज़ी गद्यानुवाद (कलकत्ता, 1894), पृष्ठ 1688–1692
स्रोत
- वाल्मीकि रामायण, किष्किंधा कांड, सर्ग 66–67, ग्रिफ़िथ का अंग्रेज़ी पद्यानुवाद, खंड 4 (1873), पृष्ठ 271–275
- वाल्मीकि रामायण, उत्तरकांड, अध्याय 40, मन्मथ नाथ दत्त का अंग्रेज़ी गद्यानुवाद (1894), पृष्ठ 1688–1692
- हनुमान चालीसा, चौपाई 18: सूर्य को मीठा फल समझकर निगल लेना
स्रोत और लाइसेंस
- हमारी व्याख्या
- इस साइट के लिए यहाँ दिए स्रोतों के आधार पर लिखा गया, और उन्हीं से मिलाया गया। श्रेय देकर आप इसे उद्धृत कर सकते हैं।
- जाँच
- दिए गए स्रोतों से मिलाया गया, 12 अक्टूबर 2026।
- अद्यतन
- 27 अक्टूबर 2026