श्रीराम और रावण

7-10 वर्ष की आयु

लंका की आख़िरी लड़ाई में इंद्र श्रीराम के लिए अपना रथ भेजते हैं, एक ऋषि उन्हें सूर्य की स्तुति सिखाते हैं, और श्रीराम दस सिर वाले राजा रावण पर विजय पाते हैं। फिर वे रावण के शोक में डूबे भाई से कहते हैं कि शत्रु के गिरते ही बैर भी खत्म हो जाता है।

पूजादीप के लिए लिखा गया, और नीचे दिए गए स्रोतों से मिलाया गया।

चित्र: धनुष लिए राम और लक्ष्मण रावण के सामने खड़े हैं। रावण के दस सिर और बीस भुजाएँ हैं।
रावण के सामने राम और लक्ष्मण। चंबा (हिमाचल प्रदेश) का चित्र, लगभग 1765। चित्र: “Rama and Lakshmana Fighting Ravana, from a Dashavatara (Ten Incarnations [of Vishnu]) series”, c. 1765। Cleveland Museum of Art, 1953.357। सार्वजनिक डोमेन (कॉपीराइट-मुक्त, CC0)। संग्रहालय की पुरानी कलाकृति।

कहानी

लंका का दस सिर वाला राजा रावण सीता माता को हर ले गया था। हनुमान जी ने उन्हें लंका में खोज लिया था, और श्रीराम पत्थरों के पुल से समुद्र पार करके वानरों की बड़ी सेना लेकर लंका पहुँचे थे। रावण के भले भाई विभीषण ने उससे विनती की थी कि सीता माता को लौटा दो, पर रावण नहीं माना, इसलिए विभीषण श्रीराम के पक्ष में आ गए थे।

लड़ाई बहुत दिनों तक चली। आख़िर रावण स्वयं अपने बड़े रथ पर बैठकर निकला, और श्रीराम पैदल ही उसके सामने खड़े हुए। स्वर्ग से देवताओं ने यह देखा और उन्हें यह बराबरी की लड़ाई नहीं लगी। तब देवताओं के राजा इंद्र ने अपना रथ, अपना सारथी मातलि, अपना धनुष, कवच और बाण नीचे भेज दिए। मातलि बोले, “रथ पर चढ़िए, राम। देवता आपके साथ हैं।”

लड़ाई लंबी और भयंकर थी। रावण के बाण आग उगलते साँप बन जाते, पर श्रीराम ने पक्षियों के राजा गरुड़ के आशीर्वाद वाले बाण चलाए, और साँप भाग गए। समुद्र में ऊँची-ऊँची लहरें उठीं, और धरती काँपने लगी।

लड़ाई के बीच ज्ञानी अगस्त्य मुनि श्रीराम के पास आकर खड़े हुए और प्रेम से बोले, “राम, उगते सूर्य की स्तुति करो, जो सारे लोकों का प्रकाश हैं और सबको बल देते हैं। उनका स्मरण करो, तुम्हें अपनी शक्ति फिर मिलेगी।” श्रीराम ने सूर्य को प्रणाम करके वह स्तुति की, और उनके मन में नया साहस भर गया।

दिन-रात दोनों महान योद्धा लड़ते रहे, और कोई पीछे नहीं हटा। तब मातलि बोले, “ब्रह्मा जी का बनाया वह बाण चलाइए।” वह एक अद्भुत बाण था, हवा के पंखों वाला, सूर्य और अग्नि जैसी चमकती नोक वाला, और पर्वत जितना भारी। अगस्त्य मुनि ने बहुत पहले वह बाण श्रीराम को दिया था।

श्रीराम ने वह बाण धनुष पर चढ़ाया और छोड़ दिया। वह रावण को लगा, और लंका का वह बलशाली राजा अपने रथ से गिर पड़ा और फिर नहीं उठा। उसकी सेना भागकर नगर में लौट गई। वानर खुशी से जयकारे लगाने लगे, आकाश से संगीत गूँजा, ठंडी, मीठी हवा चलने लगी, और श्रीराम पर फूलों की वर्षा होने लगी।

पर विभीषण अपने भाई के पास घुटनों के बल बैठकर रोने लगे। बोले, “वह वीर था। अपने मित्रों के लिए उदार था। काश उसने बात मानी होती।” श्रीराम ने विभीषण के कंधे पर हाथ रखा और बोले, “शत्रु के गिरते ही बैर भी खत्म हो जाता है। अब लड़ाई थम गई है, और हमारे बीच शांति है। उसके अंतिम संस्कार पूरे सम्मान से करो, मैं तुम्हारी सहायता करूँगा।”

फिर विभीषण लंका के राजा बने, और सीता माता आख़िर मुक्त हुईं। दशहरे पर रावण का पुतला जलते देखने वाले बहुत से परिवार इस कथा से यह भाव लेते हैं कि अच्छाई बुराई पर जीत सकती है, और सच्चा वीर गिरे हुए शत्रु के प्रति भी उदार रह सकता है।

साथ मिलकर करने के लिए

साथ मिलकर उगते सूर्य को प्रणाम करना सीखिए: दशहरे की सुबह पूर्व की ओर मुँह करके खड़े होइए, हाथ जोड़िए, और एक ऐसी बात कहिए जिसके लिए आप आभारी हैं। फिर कागज़ का एक छोटा-सा "रावण" बनाइए, उसके दसों सिरों पर एक-एक ऐसी आदत लिखिए जिसे आप छोड़ना चाहते हैं, और फिर उसे मोड़कर रख दीजिए।

दशहरा: जिस पर्व से यह कहानी जुड़ी है

और कहानियाँ

बड़ों के लिए

कहानी ऊपर पूरी हुई। यहाँ बड़ों के लिए: परिवार इसे किन दूसरे ढंगों से सुनाते हैं, और यह किन ग्रंथों से ली गई है।

कहानी में क्या अंतर मिलता है, और यह कहाँ से आई

कहानी में क्या अंतर मिलता है

उत्तर भारत में पिछली रातों से चल रही रामलीला दशहरे पर समाप्त होती है, और रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के बड़े-बड़े पुतले जलाए जाते हैं; यह रीत बाद की परंपरा की है, वाल्मीकि की नहीं। बंगाल और पूर्वी भारत में यही दिन, विजयादशमी, दुर्गा पूजा का समापन है, और दक्षिण में नवरात्रि का। कुछ कथाओं में श्रीराम इस युद्ध से पहले देवी की पूजा करते हैं; वाल्मीकि इसकी जगह सूर्य की स्तुति की बात कहते हैं।

कहानी कहाँ से आई

  • वाल्मीकि रामायण, युद्धकांड, ग्रिफ़िथ की गिनती में सर्ग 103–114: इंद्र का रथ (103); अगस्त्य और सूर्य की स्तुति, आदित्य हृदय (106); अंतिम युद्ध और रावण का पतन (109–110); विभीषण का शोक और राम का उत्तर (111); विभीषण का राज्याभिषेक (114)
  • वाल्मीकि रामायण, युद्धकांड, ग्रिफ़िथ का अंग्रेज़ी पद्यानुवाद, खंड 5 (लंदन, 1874): सर्ग 103–111, पृष्ठ 245–258; सर्ग 114, पृष्ठ 265–266

स्रोत

  • वाल्मीकि रामायण, युद्धकांड, ग्रिफ़िथ का अंग्रेज़ी पद्यानुवाद, खंड 5 (1874): सर्ग 103–111, पृष्ठ 245–258; सर्ग 114, पृष्ठ 265–266

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स्रोत और लाइसेंस

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दिए गए स्रोतों से मिलाया गया, 15 अक्टूबर 2026।
अद्यतन
27 अक्टूबर 2026

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