कान्हा ने उठाया गोवर्धन
3-6 वर्ष की आयु
कान्हा ग्वालों से कहते हैं कि इंद्र की जगह गोवर्धन पर्वत और गायों का धन्यवाद करें। इंद्र ज़ोर की बारिश भेजते हैं, तो कान्हा पूरा पर्वत एक हाथ पर उठा लेते हैं और सब उसके नीचे आ जाते हैं।
पूजादीप के लिए लिखा गया, और नीचे दिए गए स्रोतों से मिलाया गया।
कहानी
वृंदावन में ग्वाल-बाल और उनके परिवार एक बड़ी पूजा की तैयारी में लगे थे। यह पूजा इंद्र देव के लिए थी, जो बादलों और बारिश के राजा हैं। घर-घर में मिठाइयाँ, चावल और तरह-तरह के पकवान बन रहे थे।
नन्हे कान्हा ने पूछा, “बाबा, यह पूजा किसके लिए है?” नंद बाबा बोले, “इंद्र देव के लिए, लल्ला। वही तो बारिश भेजते हैं, जिससे हमारी गायों के लिए घास उगती है।”
कान्हा ने थोड़ा सोचा और बोले, “हमारी गायें तो गोवर्धन पर्वत पर चरती हैं। वही पर्वत हमें घास, पानी और छाँव देता है। चलो, इस बार यह पूजा पर्वत की, गायों की और ब्राह्मणों की करें।”
तो सबने पर्वत के आगे तरह-तरह के पकवानों का ढेर लगा दिया। गायों को हरी-हरी घास खिलाई। फिर अच्छे-अच्छे कपड़े पहनकर, गाते-बजाते, पूरे पर्वत की परिक्रमा की।
इंद्र ने यह देखा तो नाराज़ हो गए। “मेरी पूजा नहीं हुई?” वे बड़बड़ाए। उन्होंने बड़े-बड़े काले बादल भेज दिए। झमाझम बारिश होने लगी, और तेज़ हवा चलने लगी।
गायें रँभाने लगीं। बच्चों ने अपनी माँओं का हाथ थाम लिया। सब पुकारने लगे, “कान्हा, हमें बचाओ!”
कान्हा मुस्कुराए और गोवर्धन पर्वत के पास गए। फिर एक ही हाथ से पूरा पर्वत ऊपर उठा लिया, ऐसे जैसे कोई बच्चा खेल-खेल में कुकुरमुत्ता उठा ले। बहुत सी कथाओं में कहा जाता है कि उन्होंने पर्वत को बस अपनी छोटी उँगली पर उठा लिया था।
कान्हा ने पुकारा, “आओ मैया, आओ बाबा! गायों और बछड़ों को भी ले आओ!” सब लोग पर्वत के नीचे आ गए। वहाँ सूखा और आरामदेह था, जैसे किसी बहुत बड़े छाते के नीचे हों।
कान्हा सात दिन तक पर्वत को उठाए खड़े रहे। आख़िर बारिश थम गई और सूरज निकल आया। सब लोग अपनी गायों के साथ बाहर आ गए, और कान्हा ने पर्वत को धीरे से उसकी जगह पर रख दिया।
फिर सबने कान्हा को गले लगा लिया, और गोपियों ने उन्हें दही और भुना अनाज भेंट किया। बाद में इंद्र भी आए और उन्होंने क्षमा माँगी। बहुत से परिवार इस कथा से यह भाव लेते हैं कि जो पर्वत, गायें और धरती हमें पालते हैं, उनका दिल से धन्यवाद करें।
साथ मिलकर करने के लिए
साथ मिलकर आटे, मिट्टी या चावल के ढेर से छोटा-सा गोवर्धन पर्वत बनाइए, और उसके नीचे खिलौने वाली गायें और लोग रखिए। फिर एक छोटी कटोरी उनके ऊपर छाते की तरह उठाइए। चाहें तो तरह-तरह के खाने की एक छोटी-सी अन्नकूट थाली सजाकर सबके साथ बाँटिए।
गोवर्धन पूजा: जिस पर्व से यह कहानी जुड़ी है
और कहानियाँ
बड़ों के लिए
कहानी ऊपर पूरी हुई। यहाँ बड़ों के लिए: परिवार इसे किन दूसरे ढंगों से सुनाते हैं, और यह किन ग्रंथों से ली गई है।
कहानी में क्या अंतर मिलता है, और यह कहाँ से आई
कहानी में क्या अंतर मिलता है
उत्तर और पश्चिम भारत में बहुत से परिवार दिवाली के ठीक बाद गोवर्धन पूजा करते हैं। कृष्ण जी के लिए अन्नकूट बनता है, यानी पकवानों का पहाड़, और कई घरों में आँगन में गोबर या मिट्टी से छोटा-सा गोवर्धन बनाया जाता है। मथुरा के पास ब्रज में श्रद्धालु असली गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा करते हैं। गुजरात में नया साल, बेसतुं वरस, प्रायः इसी दिन शुरू होता है; किसी-किसी साल यह अगले दिन शुरू होता है। महाराष्ट्र व कर्नाटक में गोवर्धन पूजा का दिन बलि प्रतिपदा के रूप में मनाया जाता है।
कहानी कहाँ से आई
- श्रीमद्भागवत, स्कंध 10, अध्याय 24–25: 10.24 कृष्ण इंद्र की पूजा के बदले पर्वत, गायों और ब्राह्मणों की पूजा करवाते हैं; 10.25 तूफ़ान, और सात दिन तक उठाया हुआ पर्वत; इंद्र की क्षमा-याचना 10.27 में आती है
- श्रीमद्भागवत, स्कंध 10, ओवेत-बेनो का फ़्रांसीसी अनुवाद (पेरिस, 1884): अध्याय 24, पृष्ठ 122–125; अध्याय 25, पृष्ठ 126–129; अध्याय 27, पृष्ठ 133
- विष्णु पुराण, पाँचवाँ अंश, अध्याय 10–12, विल्सन का अंग्रेज़ी अनुवाद (लंदन, 1840), पृष्ठ 522–530: विष्णु पुराण में यही कथा
स्रोत
- श्रीमद्भागवत, स्कंध 10, ओवेत-बेनो का फ़्रांसीसी अनुवाद (1884): अध्याय 24–25, पृष्ठ 122–129; अध्याय 27, पृष्ठ 133
- विष्णु पुराण, पाँचवाँ अंश, अध्याय 10–12, विल्सन का अंग्रेज़ी अनुवाद (1840), पृष्ठ 522–530
स्रोत और लाइसेंस
- हमारी व्याख्या
- इस साइट के लिए यहाँ दिए स्रोतों के आधार पर लिखा गया, और उन्हीं से मिलाया गया। श्रेय देकर आप इसे उद्धृत कर सकते हैं।
- जाँच
- दिए गए स्रोतों से मिलाया गया, 15 अक्टूबर 2026।
- अद्यतन
- 28 अक्टूबर 2026