शरद पूर्णिमा का रास
11-14 वर्ष की आयु
शरद की एक उजली रात श्रीकृष्ण बाँसुरी बजाते हैं, और ब्रज की गोपियाँ सब छोड़कर उनके पास चली आती हैं। जब उनमें अभिमान आता है, तो वे अंतर्धान हो जाते हैं; गोपियाँ वन में उन्हें खोजती हैं और उनके लिए गाती हैं; और जब वे लौटते हैं, तो उनके साथ एक बड़े घेरे में ऐसा नृत्य करते हैं कि हर एक को लगता है वे उसी के पास हैं।
पूजादीप के लिए लिखा गया, और नीचे दिए गए स्रोतों से मिलाया गया।
कहानी
ब्रज में शरद ऋतु थी। चमेली खिली थी, और रातें ठंडी और साफ़ थीं। एक शाम पूर्व में पूरा चाँद उगा, गोल और सुनहरा-लाल, और उसने वन को कोमल चाँदनी से भर दिया। श्रीकृष्ण ने चाँदनी में नहाए वन को देखा और अपनी बाँसुरी बजाने लगे।
ग्वालों के गाँव की स्त्रियों, यानी गोपियों, ने वह संगीत सुना, और उनसे रुका नहीं गया। कोई गाय दुह रही थी, उसने बाल्टी छोड़ दी। किसी का दूध चूल्हे पर था, उसने वहीं छोड़ दिया। कोई परिवार को भोजन करा रही थी, कोई आँखों में काजल लगा रही थी, कोई कपड़े पहन रही थी। सबने सब कुछ छोड़ा और रात में उस ओर दौड़ पड़ीं जहाँ बाँसुरी बज रही थी, एक-दूसरे पर ध्यान दिए बिना। उनके परिवारों ने उन्हें रोकना चाहा, पर वे नहीं लौटीं; उनके मन में बस कृष्ण थे।
श्रीकृष्ण ने उनका स्वागत किया, पर फिर उनसे घर लौट जाने को कहा। बोले कि रात अँधेरी है, उनके परिवार उन्हें खोज रहे होंगे, और वे उनकी कथा सुनकर और उनका ध्यान करके भी अपना प्रेम दिखा सकती हैं। गोपियों ने आँसू भरी आँखों से उत्तर दिया कि उन्होंने उनके लिए सब कुछ छोड़ दिया है, क्योंकि वही सबसे प्रिय हैं, हर प्राणी के भीतर की आत्मा। तब श्रीकृष्ण मुस्कुराए, और वे चाँदनी में साथ-साथ गाते और घूमते रहे। पर जल्दी ही हर गोपी सोचने लगी, “कृष्ण तो मेरे लिए आए हैं। मुझसे बड़भागी कौन होगा।” जब श्रीकृष्ण ने देखा कि उनका आनंद अभिमान में बदल गया है, तो वे अचानक अंतर्धान हो गए।
उनके बिना गोपियाँ बेसुध हो गईं। वे एक पेड़ से दूसरे पेड़ तक भटकती हुई पूछतीं, “पीपल, बरगद, क्या तुमने उन्हें जाते देखा? तुलसी, तुम तो उनके चरणों से प्रेम करती हो, क्या तुमने उन्हें देखा? प्यारे हिरण, क्या वे इस ओर से गए?” वे उनका इतना ध्यान करने लगीं कि उन्हीं की तरह चलने लगीं, उन्हीं की तरह बोलने लगीं, उन्हीं की तरह खेलने लगीं।
आख़िर वे यमुना के किनारे एक साथ बैठ गईं और उनके लिए गाने लगीं, अपनी सारी तड़प एक ऐसे गीत में उड़ेल दी जिसे परिवार आज भी गाते हैं, गोपी गीत। अब वे अपने बारे में बिल्कुल नहीं सोच रही थीं। उन्हें बस वे चाहिए थे।
तभी श्रीकृष्ण पीतांबर और वनमाला पहने, मुस्कुराते हुए, फिर उनके बीच प्रकट हुए। गोपियाँ सब एक साथ उठ खड़ी हुईं, जैसे शरीर में प्राण लौट आए हों। उन्होंने पूछा, “तुम हमें छोड़कर क्यों गए?” श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया कि वे केवल इसलिए दूर गए ताकि उनका प्रेम और गहरा हो जाए, जैसे कोई निर्धन अपना जमा धन खो देने के बाद बस उसी के बारे में सोचता रहता है। बोले, “तुम्हारे जैसे प्रेम का ऋण कोई नहीं चुका सकता।”
फिर यमुना की चिकनी, उजली रेत पर रास शुरू हुआ। गोपियों ने हाथ पकड़कर एक बड़ा घेरा बनाया, और श्रीकृष्ण अपनी अद्भुत शक्ति से हर दो गोपियों के बीच मौजूद थे, ताकि हर एक को लगे कि वे उसी के साथ नाच रहे हैं। उनके कंगन और पायल खनक उठे, वे उनकी स्तुति गाने लगीं, और देवता अपने विमानों में देखने आए और आकाश से फूल बरसाने लगे। कहते हैं, चाँद और तारे भी अचरज से थम गए।
भागवत स्वयं कहती है कि श्रीकृष्ण गोपियों के, उनके पतियों के और हर प्राणी के भीतर रहने वाले साक्षी हैं, और कि कोई दूसरा, मन में भी, वैसा न करे जैसा उन्होंने यहाँ किया। बहुत से वैष्णव आचार्य गोपियों को उस आत्मा का चित्र मानते हैं जो पूरे मन से ईश्वर से प्रेम करती है, अपने को भूल जाती है और और कुछ नहीं चाहती। शरद पूर्णिमा पर चाँदनी में बैठने वाले बहुत से परिवार इससे यह भाव लेते हैं कि अभिमान प्रियतम को दूर कर देता है, और विनम्र तड़प उन्हें पास ले आती है।
साथ मिलकर करने के लिए
शरद पूर्णिमा की रात साथ मिलकर बाहर या खिड़की के पास बैठिए और चाँद को देखिए। खीर बनाइए और एक कटोरी चाँदनी में रखिए। फिर बात कीजिए: कब अभिमान ने किसी को आपसे दूर किया, और किस बात ने आपको फिर पास ला दिया?
शरद पूर्णिमा: जिस पर्व से यह कहानी जुड़ी है
और कहानियाँ
बड़ों के लिए
कहानी ऊपर पूरी हुई। यहाँ बड़ों के लिए: परिवार इसे किन दूसरे ढंगों से सुनाते हैं, और यह किन ग्रंथों से ली गई है।
कहानी में क्या अंतर मिलता है, और यह कहाँ से आई
कहानी में क्या अंतर मिलता है
शरद पूर्णिमा, यानी बरसात के बाद की पूर्णिमा, ब्रज में रास की रात के रूप में मनाई जाती है, और वहाँ रास का नृत्य और गायन होता है। बंगाल, असम और मिथिला में यही पूर्णिमा कोजागरी लक्ष्मी पूजा है, जब परिवार देवी के लिए जागते हैं; ओडिशा में यह कुमार पूर्णिमा है; और गुजरात में बहुत से लोग चाँदनी में गरबा करते हैं। बहुत से परिवार रात भर चाँदनी में खीर की कटोरी रखते हैं और सुबह उसे खाते हैं।
कहानी कहाँ से आई
- श्रीमद्भागवत, स्कंध 10, अध्याय 29–33 (रास-पंचाध्यायी): 10.29 शरद की रात, बाँसुरी, गोपियों का काम छोड़कर आना, उनके गर्व पर कृष्ण का छिप जाना; 10.30 पेड़ों के बीच खोज; 10.31 गोपी गीत; 10.32 उनका लौटना और उनका उत्तर; 10.33 रास का घेरा, देवताओं के फूल, चंद्रमा और तारों का थम जाना, और इसे कैसे समझें, इस पर परीक्षित का प्रश्न
- श्रीमद्भागवत, स्कंध 10, अध्याय 29–33, ओवेत-बेनो का फ़्रांसीसी अनुवाद (पेरिस, 1884), पृष्ठ 139–161
स्रोत
- श्रीमद्भागवत, स्कंध 10, अध्याय 29–33, ओवेत-बेनो का फ़्रांसीसी अनुवाद (1884), पृष्ठ 139–161
- मोनियर-विलियम्स, ब्राह्मण धर्म और हिंदू धर्म पर अंग्रेज़ी पुस्तक (1891), 'वल्लभ संप्रदाय', पृष्ठ 136: ऊँचे वैष्णव मत में गोपियों का कृष्ण-प्रेम आत्मा की परमात्मा से मिलने की लालसा का प्रतीक है
स्रोत और लाइसेंस
- हमारी व्याख्या
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- जाँच
- दिए गए स्रोतों से मिलाया गया, 15 अक्टूबर 2026।