गणेश जी की परिक्रमा

3-6 वर्ष की आयु

शिव जी और पार्वती माँ अपने दोनों बेटों से पूरे संसार की परिक्रमा की दौड़ लगवाते हैं। कार्तिकेय मोर पर उड़ जाते हैं, पर गणेश जी अपने माता-पिता की परिक्रमा करते हैं, क्योंकि उनके लिए वही पूरा संसार हैं।

पूजादीप के लिए लिखा गया, और नीचे दिए गए स्रोतों से मिलाया गया।

पत्थर की मूर्ति: शिव और पार्वती साथ-साथ खड़े हैं, पास में उनका बछड़ा नंदी है। उनके छोटे बेटे गणेश और कार्तिकेय उनके चरणों के पास खड़े हैं।
अपने बेटों गणेश और कार्तिकेय के साथ शिव और पार्वती। कश्मीर की पत्थर की मूर्ति, नौवीं शताब्दी। चित्र: “Shiva and Parvati with their Sons Karttikeya and Ganesha and the Calf Bull”, 9th century। The Metropolitan Museum of Art, 1989.362। सार्वजनिक डोमेन (कॉपीराइट-मुक्त, CC0)। संग्रहालय की पुरानी कलाकृति।

कहानी

कैलास पर्वत पर शिव जी और पार्वती माँ अपने दो बेटों के साथ रहते थे। कार्तिकेय फुर्तीले और बलवान थे, और मोर पर सवारी करते थे। गणेश जी गोल-मटोल और बड़े समझदार थे, और उनकी सवारी एक नन्हा चूहा था।

एक दिन नारद मुनि कैलास पर एक बहुत ही खास फल लेकर आए। दोनों भाइयों का मन उस फल पर आ गया। शिव जी मुस्कुराकर बोले, “फल तो एक ही है। चलो, एक दौड़ हो जाए।”

पार्वती माँ ने कहा, “जो पूरे संसार का चक्कर लगाकर सबसे पहले लौटेगा, फल उसी का होगा।”

कार्तिकेय झट से अपने मोर पर बैठे और फुर्र से उड़ चले, पहाड़ों के ऊपर से, नदियों के ऊपर से, बड़े नीले समुद्र के ऊपर से।

गणेश जी ने अपने चूहे की ओर देखा। चूहे ने गणेश जी की ओर देखा। संसार तो बहुत बड़ा था, और चूहा बहुत छोटा। तो गणेश जी आराम से बैठकर सोचने लगे।

फिर गणेश जी के चेहरे पर मुस्कान आ गई। उन्होंने माता-पिता से कहा कि आप दोनों साथ-साथ बैठ जाइए। फिर हाथ जोड़कर, धीरे-धीरे, बड़े प्रेम से उनकी परिक्रमा की, और उन्हें प्रणाम किया।

शिव जी ने पूछा, “तुमने हमारी परिक्रमा क्यों की?” गणेश जी बोले, “आप और माँ ही तो मेरा पूरा संसार हैं। तो मैंने पूरे संसार की परिक्रमा कर ली।”

यह सुनकर शिव जी और पार्वती माँ खुशी से हँस पड़े, और फल गणेश जी को दे दिया।

थोड़ी देर बाद कार्तिकेय थके-माँदे, धूल से भरे लौटे। सब सुनकर उनका मन उदास हो गया, और वे अकेले जाकर एक पहाड़ी पर बैठ गए। शिव जी और पार्वती माँ उनके पीछे-पीछे गए, उन्हें गले लगाया और बोले, “तुम तो खुद हमारा मीठा फल हो।”

बहुत से परिवार इस कथा से यह भाव लेते हैं कि बच्चे के लिए माता-पिता ही पूरा संसार होते हैं।

साथ मिलकर करने के लिए

घर के सब लोग मिलकर एक घेरे में बैठ जाइए। बच्चे को धीरे-धीरे पूरे परिवार की परिक्रमा करने दीजिए, फिर वह हर किसी को गले लगाए। या कागज़ पर एक बड़ा गोला बनाइए और उसमें वे लोग और चीज़ें बनाइए जो बच्चे का पूरा संसार हैं।

और कहानियाँ

बड़ों के लिए

कहानी ऊपर पूरी हुई। यहाँ बड़ों के लिए: परिवार इसे किन दूसरे ढंगों से सुनाते हैं, और यह किन ग्रंथों से ली गई है।

कहानी में क्या अंतर मिलता है, और यह कहाँ से आई

कहानी में क्या अंतर मिलता है

यह दौड़ अलग-अलग जगह अलग ढंग से सुनाई जाती है। शिव पुराण में इनाम फल नहीं है: जो बेटा पहले लौटेगा, उसका विवाह पहले होगा। गणेश जी जीतते हैं और उनका विवाह सिद्धि और बुद्धि से होता है (आज बहुत से परिवार उन्हें ऋद्धि और सिद्धि कहते हैं), और कार्तिकेय क्रौंच पर्वत पर जाकर रहने लगते हैं। वहाँ शिव जी और पार्वती माँ उनसे मिलने जाते हैं, और शिव जी मल्लिकार्जुन के रूप में पूजे जाते हैं, जो आंध्र प्रदेश के श्रीशैलम के मंदिर का नाम है। तमिलनाडु की कथाओं में नारद मुनि कैलास पर एक फल लाते हैं: कुछ कहानियों में वह आम है, और कुछ में ज्ञान पऴम्, यानी ज्ञान का फल। वहाँ कार्तिकेय, जिन्हें मुरुगन कहते हैं, पलनी की पहाड़ी पर चले जाते हैं, और शिव-पार्वती उनसे कहते हैं, “पऴम् नी”, यानी “तुम ही फल हो”; लोग कहते हैं कि पलनी नाम इन्हीं शब्दों से बना, हालाँकि पुरानी तमिल (संगम) कविताएँ इस नगर को पोतिनी कहती हैं, और यही नाम आगे चलकर पलनी बना। यह कहानी तमिल की फल वाली परंपरा के अनुसार सुनाई गई है, जो मंदिर और परिवारों की परंपरा है, शिव पुराण की नहीं: फल, नारद मुनि का आना और पहाड़ी पर माता-पिता के वचन इसी परंपरा से हैं।

कहानी कहाँ से आई

  • शिव पुराण, रुद्र संहिता, कुमार खंड (चौथा भाग), आम छपी गिनती में अध्याय 19–20: पृथ्वी की परिक्रमा की होड़ और गणेश का माता-पिता की परिक्रमा करना (अध्याय 19); वहाँ इनाम पहला विवाह है
  • शिव पुराण, संस्कृत मूल, पंचानन तर्करत्न का संपादन (कलकत्ता, बंगवासी प्रेस, शक 1812, यानी 1890–91; मुखपृष्ठ पर 'शकाब्दाः 1812'), इस छपाई में ज्ञान संहिता, अध्याय 35–37: माता-पिता पुत्रों के विवाह की बात करते हैं; जो पहले पृथ्वी की परिक्रमा करे, उसका विवाह पहले होगा; गणेश माता-पिता को बिठाकर उनकी पूजा करते हैं और उनकी परिक्रमा करते हैं; उनका विवाह विश्वरूप की पुत्रियों सिद्धि और बुद्धि से होता है; स्कंद क्रौंच पर्वत जाते हैं, जहाँ शिव उनके पीछे जाते हैं और मल्लिकार्जुन के रूप में पूजे जाते हैं
  • पलनी, मुरुगन (कार्तिकेय) के पहाड़ी मंदिर की तमिल मंदिर और पारिवारिक परंपरा: नारद का लाया फल, और पहाड़ी पर मुरुगन से कहे शिव और पार्वती के वचन; यह जीवित मौखिक और मंदिर परंपरा है, इसका कोई एक ग्रंथ नहीं

स्रोत

  • शिव पुराण, रुद्र संहिता, कुमार खंड, अध्याय 19–20 (पृथ्वी की परिक्रमा की होड़ के बाद सिद्धि और बुद्धि से गणेश का विवाह): अध्याय-संख्या आम छपाई के अनुसार, पृष्ठ की छवि पर नहीं जाँची गई; नीचे की 1890 की छपाई में यही प्रसंग ग्रंथ के दूसरे भाग में है
  • शिव पुराण, संस्कृत मूल, पंचानन तर्करत्न का संपादन (कलकत्ता, बंगवासी प्रेस, शक 1812, यानी 1890–91), ज्ञान संहिता, अध्याय 35–37; हमारे शब्दों में सार, कभी उद्धरण नहीं, क्योंकि संपादक 1940 तक जीवित रहे
  • पलनी मंदिर की परंपरा: ज्ञान का फल (ज्ञान पळम्), होड़, और 'पळम् नी' के शब्द; मौखिक और मंदिर परंपरा, जो अलग-अलग रूपों में कही जाती है (आम, या ज्ञान का फल)

परिवारों के प्रश्न

स्रोत और लाइसेंस

हमारी व्याख्या
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जाँच
दिए गए स्रोतों से मिलाया गया, 15 अक्टूबर 2026।

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