गंगा धरती पर कैसे आईं

3-6 वर्ष की आयु

राजा भगीरथ बरसों तपस्या करके गंगा जी को स्वर्ग से धरती पर बुलाते हैं। शिव जी उन्हें अपनी जटाओं में थाम लेते हैं, ताकि उनके वेग से धरती न टूटे, और गंगा जी भगीरथ के पीछे-पीछे समुद्र तक जाती हैं।

पूजादीप के लिए लिखा गया, और नीचे दिए गए स्रोतों से मिलाया गया।

चित्र: कैलास पर्वत पर शिव और पार्वती। शिव नीचे हाथ जोड़े खड़े भगीरथ की ओर देख रहे हैं। शिव की जटाओं से गंगा बह रही हैं, और पर्वत के पास एक बड़ी बर्फ़ीली झील है।
भगीरथ की प्रार्थना पर शिव की जटाओं से उतरती गंगा। उत्तर भारत के पहाड़ी राज्यों का चित्र, लगभग 1700–10। चित्र: “Descent of the Ganges”, c. 1700–1710। Cleveland Museum of Art, 2018.111। सार्वजनिक डोमेन (कॉपीराइट-मुक्त, CC0)। संग्रहालय की पुरानी कलाकृति।

कहानी

बहुत, बहुत पहले गंगा नदी धरती पर नहीं बहती थीं। वे केवल स्वर्ग में बहती थीं, उजली, पवित्र और चमचमाती।

धरती पर भगीरथ नाम के एक भले राजा रहते थे। उनके पूर्वज, राजा सगर के पुत्र, समुद्र के पास धरती के बहुत नीचे प्रतीक्षा कर रहे थे। केवल गंगा जी का पवित्र जल ही उन्हें स्वर्ग तक पहुँचा सकता था।

तो भगीरथ पहाड़ों पर तपस्या करने चले गए। ठंड में भी तप किया, बारिश में भी। बरसों-बरस तप करते रहे। आख़िर ब्रह्मा जी प्रकट हुए और बोले, “गंगा जी धरती पर आएँगी। पर उनका वेग बहुत तेज़ है। उन्हें केवल शिव जी ही थाम सकते हैं।”

तब भगीरथ ने शिव जी की आराधना की। पूरे एक बरस वे एक पैर के अँगूठे पर खड़े रहे! तब शिव जी मुस्कुराए और बोले, “मैं उन्हें अपने सिर पर थाम लूँगा।”

गंगा जी आकाश से धड़धड़ाती हुई नीचे उतरीं, छपाक, सर्र, गड़गड़! वे इतनी बड़ी थीं, इतनी तेज़। पर शिव जी बिल्कुल शांत खड़े रहे। गंगा जी उनकी लंबी, घनी जटाओं में आ गिरीं, और उनमें गोल-गोल घूमने लगीं, जैसे किसी घने जंगल में कोई नदी।

फिर शिव जी ने धीरे-धीरे, थोड़ा-थोड़ा करके उन्हें छोड़ा। अब गंगा जी धीमे-धीमे धरती पर बह चलीं, सुबह की धूप में झिलमिलातीं, और उनकी लहरों में मछलियाँ और सूँस उछलने लगीं।

भगीरथ अपने रथ पर आगे-आगे चले, और गंगा जी उनके पीछे-पीछे, मैदानों से, गाँवों और जंगलों के पास से, पूरे रास्ते बड़े समुद्र तक बहती गईं। देवता और ऋषि यह देखने आए, और सब बहुत खुश हुए।

समुद्र के पास गंगा जी का जल भगीरथ के पूर्वजों तक पहुँचा, और वे खुशी-खुशी स्वर्ग चले गए। भगीरथ गंगा जी को लाए थे, इसीलिए गंगा जी का एक नाम भागीरथी भी है।

बहुत से परिवार इस कथा से यह भाव लेते हैं कि धीरज और लगन से किया गया प्रयास संसार में कुछ अद्भुत ला सकता है।

साथ मिलकर करने के लिए

साथ मिलकर एक छोटी-सी गंगा बनाइए। एक कप पानी धीरे-धीरे किसी स्पंज या ऊन के गुच्छे पर डालिए, जैसे शिव जी की जटाओं ने नदी का वेग धीमा किया था, और देखिए कि पानी कैसे धीरे-धीरे निकलता है। फिर पहाड़ों से समुद्र तक बलखाती नदी का चित्र बनाइए।

मकर संक्रांति: जिस पर्व से यह कहानी जुड़ी है

और कहानियाँ

बड़ों के लिए

कहानी ऊपर पूरी हुई। यहाँ बड़ों के लिए: परिवार इसे किन दूसरे ढंगों से सुनाते हैं, और यह किन ग्रंथों से ली गई है।

कहानी में क्या अंतर मिलता है, और यह कहाँ से आई

कहानी में क्या अंतर मिलता है

मकर संक्रांति पर बहुत से श्रद्धालु पश्चिम बंगाल के गंगासागर में स्नान करते हैं, जहाँ गंगा जी समुद्र से मिलती हैं और जहाँ परंपरा कपिल मुनि का आश्रम मानती है। संक्रांति से यह संबंध बाद की परंपरा का है, रामायण का नहीं। रामायण यह भी बताती है कि एक बार जह्नु ऋषि ने गंगा जी को पी लिया और फिर छोड़ दिया, इसलिए उन्हें जाह्नवी भी कहते हैं।

कहानी कहाँ से आई

  • वाल्मीकि रामायण, बालकांड, ग्रिफ़िथ की गिनती में सर्ग 42–44 (ऋषि विश्वामित्र यह कथा राम को सुनाते हैं): सगर के पुत्र और गरुड़ की सलाह (42); भगीरथ की तपस्या और ब्रह्मा का वर (43); शिव गंगा को अपनी जटाओं में थामते हैं, और नदी भगीरथ के पीछे-पीछे समुद्र तक जाती है (44)
  • वाल्मीकि रामायण, बालकांड, सर्ग 42–44, ग्रिफ़िथ का अंग्रेज़ी पद्यानुवाद, खंड 1 (लंदन, 1870), पृष्ठ 184–198

स्रोत

  • वाल्मीकि रामायण, बालकांड, सर्ग 42–44, ग्रिफ़िथ का अंग्रेज़ी पद्यानुवाद, खंड 1 (1870), पृष्ठ 184–198

परिवारों के प्रश्न

स्रोत और लाइसेंस

हमारी व्याख्या
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दिए गए स्रोतों से मिलाया गया, 12 अक्टूबर 2026।
अद्यतन
15 अक्टूबर 2026

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