कान्हा और माखन
3-6 वर्ष की आयु
नन्हे कान्हा गाँव की ऊँची मटकियों से माखन निकालकर अपने सखाओं और बंदरों को खिलाते हैं। यशोदा मैया उन्हें ओखल से बाँधना चाहती हैं, पर हर रस्सी दो उँगली छोटी पड़ जाती है, जब तक कान्हा खुद न बँध जाएँ।
पूजादीप के लिए लिखा गया, और नीचे दिए गए स्रोतों से मिलाया गया।
कहानी
बहुत पुरानी बात है। गोकुल नाम के एक गाँव में नन्हे कान्हा रहते थे। उनकी माँ थीं यशोदा मैया और पिता थे नंद बाबा। गोकुल के हर घर में गायें थीं, और हर घर में दूध, दही और माखन की मटकियाँ भरी रहती थीं।
कान्हा को माखन सबसे ज़्यादा प्यारा था। इसलिए गोपियाँ माखन की मटकी छींके पर ऊँची टाँग देतीं। पर कान्हा भी कम नहीं थे! वे एक चौकी खींच लाते, उस पर ओखल रखते और ऊपर चढ़ जाते। मटकी में छोटा-सा छेद करते, और माखन नीचे आ जाता। अँधेरे कमरे में उनके गहने दीयों की तरह चमकते, तो मटकी झट से मिल जाती।
कान्हा अकेले कभी नहीं खाते थे। अपने सखाओं को खिलाते, और बंदरों को भी बाँटते। गोपियाँ शिकायत लेकर यशोदा मैया के पास आतीं, पर मैया बस हँस देतीं। अपने लाल से नाराज़ रहना उनसे होता ही नहीं था।
एक सुबह यशोदा मैया खुद दही मथ रही थीं और कान्हा की लीलाओं के गीत गुनगुना रही थीं। तभी कान्हा दौड़ते हुए आए और दूध पीने के लिए उनकी गोद में चढ़ गए। इतने में चूल्हे पर रखा दूध उफनने लगा। मैया ने कान्हा को गोद से उतारा और दूध सँभालने रसोई की ओर भागीं।
कान्हा ने मुँह फुला लिया। उन्होंने पत्थर से दही मथने वाली मटकी फोड़ दी और ताज़ा माखन लेकर एक शांत कमरे में जा बैठे। वहाँ उलटी रखी ओखल पर बैठकर वे एक बंदर को माखन खिलाने लगे।
मैया लौटीं तो टूटी मटकी देखी। वे मुस्कुरा दीं, क्योंकि समझ गईं कि यह किसकी शरारत है। ढूँढते-ढूँढते वे कान्हा और बंदर तक पहुँच गईं। कान्हा ओखल से कूदे और भाग चले! मैया पीछे-पीछे दौड़ीं, और आख़िर उन्होंने कान्हा को पकड़ ही लिया।
“अब थोड़ी देर एक जगह बैठे रहो,” मैया बोलीं। वे कान्हा को बड़ी ओखल से बाँधने के लिए रस्सी ले आईं। पर रस्सी दो उँगली छोटी पड़ गई! मैया ने दूसरी रस्सी जोड़ी, फिर भी दो उँगली छोटी। उन्होंने घर की सारी रस्सियाँ जोड़ डालीं, पर हर बार वही दो उँगली कम।
यह देखकर पड़ोस की गोपियाँ हँस पड़ीं, और मैया भी हँसने लगीं। वे पसीने से भीग गई थीं और बहुत थक गई थीं। कान्हा ने अपनी मैया को इतना थका देखा, तो चुपचाप रस्सी को अपने चारों ओर आने दिया। इस बार रस्सी पूरी आ गई।
इसीलिए कान्हा का एक नाम दामोदर भी है, यानी वह जिसके पेट पर रस्सी बँधी हो। बहुत से परिवार इस कथा से यही समझते हैं कि जिसे कोई रस्सी नहीं बाँध सकती, उसे प्रेम बाँध लेता है।
साथ मिलकर करने के लिए
किसी टेडी या गुड़िया के चारों ओर मुलायम रिबन बाँधिए और नाटक कीजिए कि रिबन हर बार दो उँगली छोटा पड़ जाता है। फिर कोई छोटा-सा नाश्ता घर में सबके साथ बाँटिए, जैसे कान्हा ने अपना माखन बाँटा था।
और कहानियाँ
बड़ों के लिए
कहानी ऊपर पूरी हुई। यहाँ बड़ों के लिए: परिवार इसे किन दूसरे ढंगों से सुनाते हैं, और यह किन ग्रंथों से ली गई है।
कहानी में क्या अंतर मिलता है, और यह कहाँ से आई
कहानी में क्या अंतर मिलता है
ब्रज और पूरे उत्तर भारत के गीतों में कान्हा को माखन चोर कहा जाता है। महाराष्ट्र में जन्माष्टमी पर दही हांडी होती है: ऊँची टँगी दही की मटकी तक पहुँचने के लिए युवा एक-दूसरे के कंधों पर चढ़ते हैं। केरल और तमिलनाडु में बाल कृष्ण को प्यार से उन्निकृष्णन और कण्णन कहते हैं।
कहानी कहाँ से आई
- श्रीमद्भागवत, स्कंध 10, अध्याय 8–9: 10.8.29–31 कृष्ण मक्खन लेते हैं और बंदरों को बाँटते हैं; 10.9.1–21 यशोदा उन्हें ओखल से बाँधती हैं
- श्रीमद्भागवत, स्कंध 10, ओवेत-बेनो का फ़्रांसीसी अनुवाद (पेरिस, 1884): अध्याय 8, श्लोक 29–31, पृष्ठ 42; अध्याय 9, श्लोक 1–21, पृष्ठ 45–47
- श्रीमद्भागवत, स्कंध 10, अध्याय 8, मन्मथ नाथ दत्त का अंग्रेज़ी अनुवाद (कलकत्ता, 1895–96), पृष्ठ 39–40; अध्याय 9 इस स्कैन में नहीं है
स्रोत
- श्रीमद्भागवत, स्कंध 10, अध्याय 8–9, ओवेत-बेनो का फ़्रांसीसी अनुवाद (1884), पृष्ठ 39–47
- श्रीमद्भागवत, स्कंध 10, अध्याय 8, मन्मथ नाथ दत्त का अंग्रेज़ी अनुवाद (1895–96), पृष्ठ 39–40
- विष्णु पुराण, पाँचवाँ अंश, अध्याय 6, विल्सन का अंग्रेज़ी अनुवाद (लंदन, 1840), पृष्ठ 509: पेट (उदर) पर बँधी रस्सी (दाम) से कृष्ण दामोदर कहलाते हैं
स्रोत और लाइसेंस
- हमारी व्याख्या
- इस साइट के लिए यहाँ दिए स्रोतों के आधार पर लिखा गया, और उन्हीं से मिलाया गया। श्रेय देकर आप इसे उद्धृत कर सकते हैं।
- जाँच
- दिए गए स्रोतों से मिलाया गया, 12 अक्टूबर 2026।
- अद्यतन
- 15 अक्टूबर 2026