जिस रात कान्हा जन्मे
3-6 वर्ष की आयु
कान्हा आधी रात को मथुरा के एक कारागार में जन्म लेते हैं। दरवाज़े अपने-आप खुल जाते हैं, और पिता वसुदेव उन्हें बारिश में यमुना पार गोकुल ले जाते हैं, जहाँ यशोदा मैया और नंद बाबा उन्हें पालेंगे।
पूजादीप के लिए लिखा गया, और नीचे दिए गए स्रोतों से मिलाया गया।
कहानी
बहुत पुरानी बात है। मथुरा नगरी में कंस नाम का एक कठोर राजा था। उसने सुना था कि एक दिन उसकी बहन देवकी का एक बेटा उसके कठोर राज का अंत करेगा। इसलिए उसने देवकी और उनके पति वसुदेव को कारागार में बंद कर रखा था, और हर दरवाज़े पर पहरेदार बिठा रखे थे।
फिर एक बहुत खास रात आई। आकाश चमकते तारों से भरा था। नदियाँ शांत बह रही थीं। तालाबों में कमल खिल उठे, चिड़ियाँ चहचहाने लगीं, और मीठी-मीठी ठंडी हवा चलने लगी।
आधी रात को देवकी की गोद में एक बालक ने जन्म लिया। वे थे कान्हा! पहले वे चार भुजाओं वाले रूप में, शंख और कमल लिए, चाँद की तरह जगमगाए। फिर वे एक नन्हे-से शिशु बन गए, बिल्कुल दूसरे बच्चों जैसे।
वसुदेव ने बच्चे को गोद में उठाया। तभी एक अद्भुत बात हुई। सारे पहरेदार गहरी नींद में सो गए। भारी-भारी ताले खुल गए, और बड़े-बड़े दरवाज़े अपने-आप खुल गए।
बाहर झमाझम बारिश हो रही थी। वसुदेव कान्हा को सीने से लगाए बाहर निकले। उनके पीछे-पीछे शेषनाग आए, जिनके बहुत सारे फन हैं। उन्होंने अपने फन छाते की तरह फैला दिए, ताकि नन्हा कान्हा भीगे नहीं।
वे यमुना नदी के किनारे पहुँचे। नदी गहरी थी और उसमें ऊँची-ऊँची लहरें उठ रही थीं। पर यमुना जी ने उनके लिए रास्ता बना दिया, और वसुदेव पैदल ही उस पार पहुँच गए।
उस पार गोकुल गाँव था, जहाँ सब सो रहे थे। नंद बाबा के घर उनकी पत्नी यशोदा को अभी-अभी एक बिटिया हुई थी। वसुदेव ने धीरे से कान्हा को यशोदा के पास लिटा दिया और बिटिया को अपने साथ मथुरा ले आए।
सुबह यशोदा मैया जागीं तो अपने पास एक सुंदर-सा बालक देखा। पूरा गोकुल खुशी से नाच उठा, गाने लगा। कान्हा गोकुल आ गए थे, जहाँ वे गायों, माखन और ढेर सारे प्यार के बीच बड़े होने वाले थे।
बहुत से परिवार इस कथा से यह भाव लेते हैं कि एक नन्ही-सी रोशनी भी सबसे अँधेरी रात में अपना रास्ता खोज लेती है।
साथ मिलकर करने के लिए
साथ मिलकर जूते के डिब्बे और मुलायम कपड़े से एक छोटा-सा पालना बनाइए, और उसमें नन्हे कान्हा के लिए कोई गुड़िया या फूल रखिए। फिर छाते या खुली किताब से शेषनाग बनिए, और पालने को कमरे के उस पार ले जाते हुए "बच्चे" को भीगने से बचाइए।
जन्माष्टमी: जिस पर्व से यह कहानी जुड़ी है
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बड़ों के लिए
कहानी ऊपर पूरी हुई। यहाँ बड़ों के लिए: परिवार इसे किन दूसरे ढंगों से सुनाते हैं, और यह किन ग्रंथों से ली गई है।
कहानी में क्या अंतर मिलता है, और यह कहाँ से आई
कहानी में क्या अंतर मिलता है
जन्माष्टमी कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाई जाती है, और बहुत से परिवार आधी रात तक, जो कान्हा के जन्म की घड़ी है, जागते हैं, भजन गाते हैं और नन्हे कान्हा का पालना झुलाते हैं। महाराष्ट्र में अगले दिन दही हांडी होती है; मथुरा-वृंदावन के आसपास के ब्रज में यह उत्सव कई दिन चलता है। बहुत सी कथाओं में वसुदेव कान्हा को सिर पर टोकरी में रखकर ले जाते हैं; भागवत के अनुसार वे उन्हें गोद में लेकर गए।
कहानी कहाँ से आई
- श्रीमद्भागवत, स्कंध 10, अध्याय 3: 10.3.1–8 जन्म की रात; 10.3.9–46 चार भुजाओं वाला रूप, फिर एक शिशु; 10.3.47–53 सोते पहरेदार, खुले द्वार, शेषनाग के फन, यमुना, और गोकुल में बच्चों की अदला-बदली
- श्रीमद्भागवत, स्कंध 10, अध्याय 3, ओवेत-बेनो का फ़्रांसीसी अनुवाद (पेरिस, 1884), पृष्ठ 14–19
- श्रीमद्भागवत, स्कंध 10, अध्याय 3, मन्मथ नाथ दत्त का अंग्रेज़ी अनुवाद (कलकत्ता, 1895–96), पृष्ठ 13–19
स्रोत
- श्रीमद्भागवत, स्कंध 10, अध्याय 3, ओवेत-बेनो का फ़्रांसीसी अनुवाद (1884), पृष्ठ 14–19
- श्रीमद्भागवत, स्कंध 10, अध्याय 3, मन्मथ नाथ दत्त का अंग्रेज़ी अनुवाद (1895–96), पृष्ठ 13–19
स्रोत और लाइसेंस
- हमारी व्याख्या
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- जाँच
- दिए गए स्रोतों से मिलाया गया, 12 अक्टूबर 2026।
- अद्यतन
- 15 अक्टूबर 2026