जगन्नाथ और बंद दरवाज़ा

3-6 वर्ष की आयु

राजा इंद्रद्युम्न भगवान के दर्शन के लिए तरसते हैं। एक रहस्यमय बूढ़ा बढ़ई बंद दरवाज़े के पीछे पवित्र मूर्तियाँ गढ़ने को तैयार होता है, इस शर्त पर कि कोई झाँके नहीं। राजा समय से पहले झाँक लेते हैं, और इसीलिए जगन्नाथ जी की बड़ी-बड़ी गोल आँखें हैं और हाथ-पैर नहीं।

पूजादीप के लिए लिखा गया, और नीचे दिए गए स्रोतों से मिलाया गया।

चित्र: कमल के फूलों वाली मेहराब के नीचे जगन्नाथ, सुभद्रा और बलराम के गोल मुख और बड़ी-बड़ी आँखें।
जगन्नाथ, सुभद्रा और बलराम। दक्षिण भारत का चित्र, अठारहवीं शताब्दी। चित्र: “Jagannath, Subhadra and Balarama in an Arch (verso)”, 1700s। Cleveland Museum of Art, 1973.102.b। सार्वजनिक डोमेन (कॉपीराइट-मुक्त, CC0)। संग्रहालय की पुरानी कलाकृति।

कहानी

बहुत पहले इंद्रद्युम्न नाम के एक राजा थे। वे भगवान विष्णु से बहुत प्रेम करते थे। उन्होंने सुना कि समुद्र किनारे ओडिशा की नीली पहाड़ियों में भगवान नीलमाधव रूप में रहते हैं। तो राजा उनके दर्शन को चल पड़े।

पर जब राजा वहाँ पहुँचे, तो भगवान छिप गए थे। राजा इतने दुखी हुए कि रोने लगे। तभी आकाश से एक आवाज़ आई, “लकड़ी की एक मूर्ति बनाओ, और भगवान उसमें बसेंगे।”

जल्दी ही एक बूढ़ा बढ़ई राजा के पास आया। बोला, “मैं तुम्हारे लिए मूर्तियाँ बना दूँगा। पर तुम्हें मुझे कमरे में बंद करना होगा, और जब तक मैं काम पूरा न कर लूँ, कोई मुझे नहीं देखेगा। अगर किसी ने देखा, तो मैं उसी पल काम छोड़ दूँगा।”

राजा ने वचन दे दिया। दरवाज़ा बंद हो गया। भीतर से बढ़ई के काम की आवाज़ आती: ठक, ठक, ठक। दिन पर दिन, ठक, ठक, ठक।

राजा इंतज़ार करते रहे, करते रहे, पूरे पंद्रह दिन। फिर उनसे और रुका नहीं गया। सोचा, “भीतर क्या हो रहा है?” और उन्होंने दरवाज़ा खोलकर भीतर झाँक लिया।

बढ़ई ने उसी पल काम रोक दिया था, जैसा उसने कहा था। मूर्तियाँ अधूरी थीं। उनकी बड़ी-बड़ी, गोल, खुली आँखें थीं, पर न हाथ थे, न पैर। राजा को बहुत पछतावा हुआ। उन्होंने अपना वचन तोड़ दिया था।

तब राजा ब्रह्मा जी के पास गए, और ब्रह्मा जी ने उन्हें ढाढ़स बँधाया। बोले, “दुखी मत हो। मैं इस मूर्ति को इसी रूप में प्रसिद्ध कर दूँगा।” ब्रह्मा जी ने मूर्तियों में प्राण डाले, और राजा ने उन्हें समुद्र किनारे एक बड़े मंदिर में स्थापित किया। मूर्तियाँ तीन थीं: जगन्नाथ, यानी संसार के स्वामी, उनके भाई बलभद्र और उनकी बहन सुभद्रा।

बहुत से लोग कहते हैं कि वह बूढ़ा बढ़ई देवताओं के शिल्पी विश्वकर्मा थे, और कुछ कहते हैं कि वे स्वयं विष्णु थे। और हर साल रथ यात्रा पर जगन्नाथ जी अपने भाई और बहन के साथ मंदिर से बाहर आते हैं और बड़े-बड़े रथों पर सवार होकर गलियों में निकलते हैं, ताकि हर कोई उन बड़ी-बड़ी गोल आँखों के दर्शन कर सके।

रथ यात्रा पर रथ की रस्सी खींचने वाले बहुत से परिवार इस कथा से यह भाव लेते हैं कि भगवान जैसे हैं, वैसे ही सबसे मिलने बाहर आते हैं।

साथ मिलकर करने के लिए

जूते के डिब्बे से एक छोटा-सा रथ बनाइए, बोतल के ढक्कनों के पहिए लगाइए और खींचने के लिए डोरी बाँधिए। कागज़ के गोले पर जगन्नाथ जी की बड़ी-बड़ी गोल आँखें बनाकर उन्हें रथ में बिठाइए। फिर बारी-बारी से गाते हुए रथ को पूरे घर में खींचिए।

रथ यात्रा: जिस पर्व से यह कहानी जुड़ी है

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बड़ों के लिए

कहानी ऊपर पूरी हुई। यहाँ बड़ों के लिए: परिवार इसे किन दूसरे ढंगों से सुनाते हैं, और यह किन ग्रंथों से ली गई है।

कहानी में क्या अंतर मिलता है, और यह कहाँ से आई

कहानी में क्या अंतर मिलता है

यह कथा कई तरह से सुनाई जाती है। आइन-ए-अकबरी में दर्ज एक कथा के अनुसार मूर्ति समुद्र से बहकर आई लकड़ी के एक कुंदे से बनी। दूसरी कथाओं में बूढ़ा बढ़ई विश्वकर्मा थे, या वेश बदले स्वयं विष्णु। 1872 में डब्ल्यू. डब्ल्यू. हंटर ने ओडिशा में जो कथा सुनी, उसमें विष्णु बूढ़े बढ़ई के रूप में आते हैं, इक्कीस दिन के लिए मंदिर में बंद किए जाते हैं, और रानी के कहने पर राजा समय से पहले दरवाज़ा खोल देते हैं। पुरी में बहुत बरसों में एक बार नई लकड़ी से मूर्तियाँ फिर से गढ़ी जाती हैं, जिसे नवकलेवर कहते हैं। आज रथ यात्रा दुनिया के बहुत से शहरों में निकलती है।

कहानी कहाँ से आई

  • पुरी के जगन्नाथ मंदिर की परंपरा, जैसी वह 1931 से पहले अंग्रेज़ी में लिखी गई: एक बांग्ला वृत्तांत से, विलियम वार्ड के वृत्तांत से, और ओडिशा में डब्ल्यू. डब्ल्यू. हंटर के लेखन में: इंद्रद्युम्न, छिपाए गए नीलमाधव, आकाश से आई आवाज़, बढ़ई की शर्त, पंद्रह दिन बाद राजा का भीतर देखना, अधूरी छोड़ी गई मूर्ति, और ब्रह्मा का उसे आँखें और आत्मा देना
  • डब्ल्यू. जे. विल्किन्स, वैदिक और पौराणिक हिंदू देवकथाओं पर अंग्रेज़ी पुस्तक (कलकत्ता, 1882), 'जगन्नाथ', पृष्ठ 208–211
  • डब्ल्यू. डब्ल्यू. हंटर, ओडिशा पर अंग्रेज़ी पुस्तक, खंड 1 (लंदन, 1872), 'जगन्नाथ की कथा', पृष्ठ 89–93

स्रोत

  • डब्ल्यू. जे. विल्किन्स, वैदिक और पौराणिक हिंदू देवकथाओं पर अंग्रेज़ी पुस्तक (1882), 'जगन्नाथ', पृष्ठ 208–211
  • डब्ल्यू. डब्ल्यू. हंटर, ओडिशा पर अंग्रेज़ी पुस्तक, खंड 1 (1872), 'जगन्नाथ की कथा', पृष्ठ 89–93

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दिए गए स्रोतों से मिलाया गया, 13 अक्टूबर 2026।
अद्यतन
15 अक्टूबर 2026

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