पार्वती का तप

11-14 वर्ष की आयु

जब केवल सुंदरता से शिव का मन नहीं जीता जा सका, तो पार्वती पिता का महल छोड़कर तपस्विनी बन जाती हैं, और गर्मी की धूप, बरसात और सर्दी की बर्फ़ में तप करती हैं। एक युवा तपस्वी शिव की निंदा करके उनकी परीक्षा लेने आता है, और वे उसे ऐसा उत्तर देती हैं कि वह तपस्वी अपना असली रूप प्रकट कर देता है।

पूजादीप के लिए लिखा गया, और नीचे दिए गए स्रोतों से मिलाया गया।

चित्र: पेड़ों के नीचे चर्म के आसन पर शिव ध्यान में बैठे हैं, पास में उनका बैल नंदी है। पार्वती वीणा लिए उनके पास बैठी हैं।
ध्यान में बैठे शिव के पास पार्वती। गुलेर (हिमाचल प्रदेश) का चित्र, उन्नीसवीं शताब्दी का आरंभ। चित्र: “Shiva enraged by Parvati's interruption of his meditation”, early 19th century। The Metropolitan Museum of Art, 2019.146। सार्वजनिक डोमेन (कॉपीराइट-मुक्त, CC0)। संग्रहालय की पुरानी कलाकृति।

कहानी

हिमालय की बेटी पार्वती शिव से प्रेम करती थीं। पर शिव ध्यान में लीन रहते थे, और जब प्रेम के देवता कामदेव ने उनके मन में प्रेम जगाने का प्रयास किया, तो शिव ने अपने तीसरे नेत्र की अग्नि से कामदेव को भस्म कर दिया और चले गए। लगता था कि पार्वती की सुंदरता काफ़ी नहीं थी।

तब पार्वती ने उन्हें दूसरे ढंग से पाने का निश्चय किया: तप से। उनकी माँ मैना ने उन्हें गले लगाकर रोका, “तुम्हारा शरीर इतने कठोर व्रतों के लिए बहुत कोमल है।” पर पार्वती का संकल्प माँ के आँसुओं से भी दृढ़ था। पिता ने उनके लिए एक शांत पर्वत खोज दिया, और वे वहाँ चली गईं।

उन्होंने अपने मोती और रेशमी वस्त्र उतार दिए और खुरदरा वल्कल पहन लिया। वे अपनी बाँह को तकिया बनाकर नंगी धरती पर सोतीं। छोटे पेड़ों को ऐसे सींचतीं जैसे वे उनके बच्चे हों, और हिरण इतने हिल-मिल गए कि उनके हाथ से दाना खाने लगे।

फिर उन्होंने अपना तप और कठोर कर दिया। गर्मी में वे चार धधकती अग्नियों के बीच बैठतीं, और ऊपर से सूर्य तपता। बरसात में वे चट्टान पर लेटी रहतीं, जब मूसलाधार बारिश होती और बिजली चमकती। सर्दी में वे ठंडी धरती पर लेटी रहतीं, और चारों ओर बर्फ़ उड़ती रहती। आख़िर उन्होंने गिरे हुए पत्ते खाना भी छोड़ दिया, और इसीलिए ऋषियों ने उन्हें अपर्णा कहा, यानी जो एक पत्ता भी न ले।

एक दिन जटाधारी, मृगछाला पहने, हाथ में दंड लिए एक युवा तपस्वी आया। पार्वती ने उसका स्वागत किया। उसने धीरे से पूछा कि इतनी कम उम्र में, इतनी लाड़-प्यार में पली कन्या ऐसा जीवन क्यों जी रही है। जब पार्वती की सखी ने बताया कि वे केवल शिव को चाहती हैं, तो तपस्वी ने हैरान होने का नाटक किया।

बोला, “शिव? वे तो साँपों के कंगन पहनते हैं, हाथी की खाल ओढ़ते हैं। शरीर पर भस्म मलते हैं, श्मशानों में रहते हैं, और एक बूढ़े बैल पर सवारी करते हैं। कोई जानता भी नहीं कि उनके माता-पिता कौन थे। तुम राजकुमारी होकर उन्हें कैसे चाह सकती हो?”

पार्वती की आँखें क्रोध से चमक उठीं। बोलीं, “तुम उन्हें नहीं समझते। छोटे मन वाले हमेशा महान लोगों का उपहास करते हैं। शिव को धन की ज़रूरत नहीं, क्योंकि सारे धन का स्रोत वही हैं। वे भस्म के बीच रहते हैं, फिर भी तीनों लोकों के स्वामी हैं। इंद्र भी उनके चरणों में सिर झुकाते हैं। जो ब्रह्मा के भी स्वामी हैं, उनका आरंभ कौन गिन सकता है? तुम चाहे जो कहो, मेरा मन उन्हीं का है। सखी, इस लड़के को यहाँ से भेज दो। महान लोगों की निंदा करने वाला ही नहीं, सुनने वाला भी दोषी होता है।”

वे जाने के लिए मुड़ीं। पर जैसे ही मुड़ीं, तपस्वी का रूप बदल गया। उनके सामने स्वयं शिव खड़े थे। पार्वती ठिठक गईं, एक पैर जाने को उठा हुआ और एक टिका हुआ, जैसे किसी चट्टान से क्षण भर को रुकी हुई नदी। माथे पर चंद्रमा चमक रहा था, और शिव ने कोमल स्वर में कहा, “कोमल हृदय वाली, आज से तुम्हारे तप ने मुझे तुम्हारा बना लिया है।” उनकी सारी थकान मिट गई।

हरतालिका तीज मनाने वाले बहुत से परिवार इस कथा से यह भाव लेते हैं कि जो मन जानता है कि उसे किससे प्रेम है, और उपहास से नहीं डगमगाता, वह सुंदरता से भी बलवान है और संदेह से भी।

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हरतालिका तीज: जिस पर्व से यह कहानी जुड़ी है

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बड़ों के लिए

कहानी ऊपर पूरी हुई। यहाँ बड़ों के लिए: परिवार इसे किन दूसरे ढंगों से सुनाते हैं, और यह किन ग्रंथों से ली गई है।

कहानी में क्या अंतर मिलता है, और यह कहाँ से आई

कहानी में क्या अंतर मिलता है

उत्तर भारत और महाराष्ट्र में बहुत सी स्त्रियाँ पार्वती माँ के तप की याद में, प्रायः व्रत रखकर, हरतालिका तीज मनाती हैं। इस नाम का अर्थ प्रायः बाद की एक कथा से समझाया जाता है, जिसमें पार्वती की सखियाँ उन्हें वन में ले गईं ताकि उनका विवाह शिव के सिवा किसी और से न हो; यह कथा कालिदास के काव्य में नहीं है।

कहानी कहाँ से आई

  • कालिदास का कुमारसंभव, सर्ग 5 (और सर्ग 3 में कामदेव का भस्म होना): उमा का तप का निश्चय, माँ की विनती, वल्कल वस्त्र, पेड़ और हिरन के बच्चे, चार अग्नियाँ और ऋतुएँ, 'अपर्णा' नाम, एक तपस्वी का आना और उसका उपहास, उमा का उत्तर, और शिव का प्रकट होना
  • कालिदास का कुमारसंभव, ग्रिफ़िथ का अंग्रेज़ी पद्यानुवाद (लंदन, 1853): सर्ग 3, शिव के नेत्र की अग्नि से कामदेव का भस्म होना, पृष्ठ 30–31; सर्ग 5, 'उमा का पुरस्कार', पृष्ठ 41–54

स्रोत

  • कालिदास का कुमारसंभव, ग्रिफ़िथ का अंग्रेज़ी पद्यानुवाद (1853): सर्ग 3, पृष्ठ 30–31; सर्ग 5, पृष्ठ 41–54

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स्रोत और लाइसेंस

हमारी व्याख्या
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जाँच
दिए गए स्रोतों से मिलाया गया, 13 अक्टूबर 2026।
अद्यतन
25 अक्टूबर 2026

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