समुद्र मंथन

7-10 वर्ष की आयु

देवता और असुर मिलकर अमृत के लिए क्षीरसागर का मंथन करते हैं। विष्णु कछुआ बनकर पर्वत को थामते हैं, शिव सबसे पहले निकला विष पी लेते हैं, और लहरों से अनोखे रत्न निकलते हैं, जिनमें लक्ष्मी जी भी हैं।

पूजादीप के लिए लिखा गया, और नीचे दिए गए स्रोतों से मिलाया गया।

चित्र: देवता और असुर पर्वत पर लिपटे नाग वासुकि को खींच रहे हैं। नीचे से एक कछुआ पर्वत को थामे है, और ऊपर विष्णु बैठे हैं। समुद्र से निकले रत्न आकाश में दिख रहे हैं।
क्षीर सागर का मंथन। मंडी (हिमाचल प्रदेश) का चित्र, लगभग 1780–90। चित्र: “The Churning of the Ocean of Milk”, ca. 1780–90। The Metropolitan Museum of Art, 1977.443.2। सार्वजनिक डोमेन (कॉपीराइट-मुक्त, CC0)। संग्रहालय की पुरानी कलाकृति।

कहानी

बहुत पुराने समय की बात है। स्वर्ग के देवता कमज़ोर पड़ गए थे, और उनके प्रतिद्वंद्वी असुर बलवान हो गए थे। देवता ब्रह्मा जी के पास गए, और ब्रह्मा जी उन्हें क्षीरसागर, यानी दूध के समुद्र, के किनारे ले गए। वहाँ सबने मिलकर भगवान विष्णु से सहायता की प्रार्थना की।

भगवान विष्णु प्रकट हुए, हज़ारों सूरजों जैसे जगमगाते। बोले, “असुरों से मेल कर लो। सब मिलकर क्षीरसागर को मथो। उसमें से अमृत निकलेगा, जिसे पीने वाला अमर हो जाता है। आगे की चिंता मुझ पर छोड़ दो।”

तो देवता असुरों के राजा बलि के पास गए, और दोनों पक्ष साथ काम करने को राज़ी हो गए। उन्होंने मंदार पर्वत को उखाड़ा और उसे मथानी बनाया, ठीक वैसे ही जैसे घर में दही मथने के लिए लकड़ी की मथानी चलाते हैं। रस्सी के लिए उन्होंने नागों के राजा वासुकि से कहा कि वे पर्वत के चारों ओर लिपट जाएँ। वासुकि मान गए, क्योंकि उन्हें भी अमृत में हिस्सा देने का वचन मिला था।

देवताओं ने वासुकि का मुँह वाला सिरा पकड़ा। पर असुर बोले, “हम पूँछ क्यों पकड़ें? हम भी तुमसे कम नहीं!” तब विष्णु और देवता मुस्कुराए और पूँछ की ओर चले गए, और असुरों ने मुँह की ओर से पकड़ लिया। फिर सब खींचने लगे, इधर से उधर, उधर से इधर।

पर पर्वत बहुत भारी था। नीचे कोई आधार नहीं था, सो वह समुद्र में धँसने लगा। तब भगवान विष्णु ने एक विशाल कछुए का रूप लिया, जिसे कूर्म अवतार कहते हैं, और समुद्र में नीचे जाकर पर्वत को अपनी चौड़ी पीठ पर थाम लिया। मंथन फिर शुरू हुआ। कूर्म भगवान को पीठ पर घूमता पर्वत ऐसा लगा जैसे कोई मीठी-सी खुजली कर रहा हो।

वासुकि की साँसें गरम और धुएँ भरी थीं, तो मुँह की ओर खड़े असुर गरमी से थकने लगे, और पूँछ की ओर खड़े देवताओं पर बादल ठंडी फुहारें बरसाते रहे। समुद्र घूमने लगा, झाग उठने लगे, और मछलियाँ व जलजीव इधर-उधर भागने लगे।

तभी पानी में से कुछ खतरनाक निकला: हलाहल नाम का काला विष, जो लहरों पर फैलता गया और हवा में भरता गया। किसी को कुछ नहीं सूझा। सब जल्दी से कैलास पर्वत पर शिव जी के पास पहुँचे और बोले, “कृपया हमारी सहायता कीजिए!”

शिव जी का मन करुणा से भर गया। उन्होंने पार्वती माँ से कहा, “जो संकट में हों, उनकी रक्षा करना ही ठीक है।” उन्होंने विष को अपनी हथेली में लिया और पी गए। पार्वती माँ उनकी शक्ति जानती थीं, इसलिए वे निश्चिंत रहीं। विष शिव जी के गले में ही रुक गया और उसे नीला कर दिया। तभी से शिव जी को नीलकंठ कहते हैं, यानी नीले कंठ वाले।

मंथन चलता रहा, और लहरों में से एक के बाद एक अनोखे रत्न निकलने लगे: कामधेनु सुरभि गाय; चाँद जैसा चमकता उच्चैःश्रवा घोड़ा; चार दाँतों वाला सफ़ेद हाथी ऐरावत; चमचमाती कौस्तुभ मणि, जिसे विष्णु धारण करते हैं; सुगंधित फूलों वाला पारिजात वृक्ष; और स्वर्ग की नाचती अप्सराएँ।

फिर कमल पर विराजमान, बिजली जैसी दमकती लक्ष्मी जी समुद्र से प्रकट हुईं। दिशाओं के हाथियों ने सोने के कलशों से उन पर जल बरसाया, और समुद्र ने उन्हें रेशमी वस्त्र भेंट किए। लक्ष्मी जी ने वहाँ सबकी ओर देखा, और भगवान विष्णु को चुनकर उनके गले में कमल की माला डाल दी।

सबसे आख़िर में धन्वंतरि निकले, जो वैद्य हैं और आयुर्वेद के जनक माने जाते हैं, हाथ में अमृत का कलश लिए। असुरों ने झट से कलश छीन लिया और भाग गए, और फिर आपस में झगड़ने लगे कि पहले कौन पिएगा।

तभी असुरों के बीच एक बहुत सुंदर स्त्री आई, इतनी मनमोहक कि उनका झगड़ा थम गया। बोली, “मैं बाँट दूँ? बस वचन दो कि जैसा मैं करूँ, वही मानोगे।” असुर मान गए और पंक्तियों में बैठ गए। पर वह तो वेश बदले हुए स्वयं विष्णु थे, जिन्हें मोहिनी कहते हैं। मोहिनी ने देवताओं को अमृत पिलाया, और वचन दे चुके असुर चुपचाप बैठे रहे।

अमृत पीकर देवता फिर से बलवान हो गए, और तीनों लोकों में फिर से प्रकाश और भलाई लौट आई। बहुत से परिवार इस कथा से यह भाव लेते हैं कि जब सब मिलकर मेहनत करते हैं तो अनमोल रत्न निकलते हैं, और कभी-कभी किसी एक को सबकी भलाई के लिए सबसे कठिन काम अपने ऊपर लेना पड़ता है।

साथ मिलकर करने के लिए

अपने हाथों से माखन निकालिए। एक साफ़ बोतल या डिब्बे में थोड़ी मलाई या क्रीम डालिए, ढक्कन कसकर बंद कीजिए, और बारी-बारी से हिलाइए, जैसे देवता और असुर रस्सी खींच रहे थे, जब तक माखन का गोला न बन जाए। फिर जितने रत्न याद हों, उनके नाम गिनाइए।

और कहानियाँ

बड़ों के लिए

कहानी ऊपर पूरी हुई। यहाँ बड़ों के लिए: परिवार इसे किन दूसरे ढंगों से सुनाते हैं, और यह किन ग्रंथों से ली गई है।

कहानी में क्या अंतर मिलता है, और यह कहाँ से आई

कहानी में क्या अंतर मिलता है

विष्णु पुराण में मंथन की कथा थोड़ी अलग है: वहाँ यह दुर्वासा ऋषि के इंद्र को दिए शाप से शुरू होती है, और विष नाग ग्रहण करते हैं। लोक में चौदह रत्नों की गिनती होती है, और यह सूची जगह-जगह थोड़ी बदल जाती है। बाद की परंपरा कहती है कि अमृत की बूँदें चार जगह गिरी थीं, प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक में, जहाँ कुंभ मेला लगता है। बहुत से परिवार दिवाली से ठीक पहले धनतेरस पर धन्वंतरि का स्मरण करते हैं।

कहानी कहाँ से आई

  • श्रीमद्भागवत, स्कंध 8, अध्याय 5–8 (और अध्याय 9 का आरंभ): 8.5–6 देवताओं की प्रार्थना, विष्णु की सलाह, बलि से संधि; 8.7 मंदराचल, वासुकि, कूर्म, और शिव का विष पीना; 8.8 रत्न, लक्ष्मी, धन्वंतरि, मोहिनी; 8.9 मोहिनी अमृत बाँटती हैं
  • श्रीमद्भागवत, स्कंध 8, अध्याय 5–9, मन्मथ नाथ दत्त का अंग्रेज़ी अनुवाद (कलकत्ता, 1895–96), पृष्ठ 14–33
  • विष्णु पुराण, पहला अंश, अध्याय 9: दुर्वासा का शाप, मंथन, समुद्र से निकली वस्तुएँ, और श्री की स्तुति
  • विष्णु पुराण, पहला अंश, अध्याय 9, विल्सन का अंग्रेज़ी अनुवाद (लंदन, 1840), पृष्ठ 70–81

स्रोत

  • श्रीमद्भागवत, स्कंध 8, अध्याय 5–9, मन्मथ नाथ दत्त का अंग्रेज़ी अनुवाद (1895–96), पृष्ठ 14–33
  • विष्णु पुराण, पहला अंश, अध्याय 9, विल्सन का अंग्रेज़ी अनुवाद (1840), पृष्ठ 70–81

परिवारों के प्रश्न

स्रोत और लाइसेंस

हमारी व्याख्या
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दिए गए स्रोतों से मिलाया गया, 12 अक्टूबर 2026।
अद्यतन
15 अक्टूबर 2026

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