वराह ने उठाई धरती

7-10 वर्ष की आयु

संसार के एक नए युग की शुरुआत में धरती गहरे पानी के नीचे डूबी पड़ी है। विष्णु एक विशाल वराह का रूप लेकर नीचे गोता लगाते हैं, धरती को अपने दाँतों पर उठाकर पानी पर तैरा देते हैं, और फिर संसार की रचना नए सिरे से होती है।

पूजादीप के लिए लिखा गया, और नीचे दिए गए स्रोतों से मिलाया गया।

पत्थर की मूर्ति: वराह रूप में विष्णु, जिनका सिर सूअर का और शरीर मनुष्य का है। धरती देवी की छोटी-सी आकृति उनके दाँत पर बैठी है।
धरती देवी को उठाते वराह। राजस्थान की बलुआ पत्थर की मूर्ति, ग्यारहवीं शताब्दी। चित्र: “Boar Incarnation of God Vishnu (Varaha) Lifting the Earth Goddess Bhudevi”, 11th century। Art Institute of Chicago, 1997.707। सार्वजनिक डोमेन (कॉपीराइट-मुक्त, CC0)। संग्रहालय की पुरानी कलाकृति।

कहानी

पुरानी कथाएँ कहती हैं कि संसार के बहुत से युग होते हैं, दिन और रात की तरह, जो बार-बार लौटकर आते हैं। एक लंबी ब्रह्मांडीय रात के अंत में वह महान ईश्वर जागे, जो ब्रह्मा बनकर संसार रचते हैं और विष्णु बनकर उसका पालन करते हैं। उन्होंने चारों ओर देखा, तो बस पानी ही पानी दिखा। धरती कहाँ थी?

धरती पानी की सबसे निचली तह में डूब गई थी। तो भगवान ने उसे ऊपर लाने का निश्चय किया। पिछले युगों में उन्होंने मछली और कछुए का रूप लिया था। इस बार उन्होंने एक विशाल वराह का रूप लिया, पर्वत जितना बड़ा, साँवले रंग का, कमल जैसी आँखों और बड़े-बड़े दाँतों वाला।

वे नीचे, और नीचे, और नीचे गहराई में उतरते गए। धरती माता ने उन्हें आते देखा तो प्रणाम करके प्रार्थना की, “पुराने दिनों में भी आपने मुझे उठाया था। आज फिर उठाइए। सब कुछ आपसे ही तो है।”

वराह भगवान ने गहरी, गूँजती आवाज़ की, जैसे सामवेद का गान हो। वेद हिंदुओं के सबसे पुराने पवित्र ग्रंथ हैं, और सामवेद गान का वेद है। फिर उन्होंने पूरी धरती को अपने दाँतों की नोक पर उठा लिया और पानी से ऊपर उठ आए। जब उन्होंने सिर उठाया, तो उनके माथे से बहते जल ने ऊपर रहने वाले ऋषियों को नहला दिया, और ऋषि आनंद से भरकर उनके बालों को पकड़े रहे।

ऋषियों ने उनकी स्तुति गाई, “आपके चरण वेद हैं, आपकी जिह्वा यज्ञ की अग्नि है, आपकी वाणी मंत्रों का गान है। धरती आपके दाँतों की नोक पर ऐसे टिकी है जैसे तालाब से उठाया गया कमल का पत्ता।”

वराह भगवान ने धरती को धीरे से पानी के ऊपर रख दिया, जहाँ वह एक बड़े जहाज़ की तरह तैरने लगी। उन्होंने उसे समतल किया और उस पर पर्वत खड़े किए। फिर ब्रह्मा के रूप में भगवान ने फिर से रचना शुरू की: पेड़-पौधे, पशु-पक्षी, देवता और मनुष्य।

उगादि और गुड़ी पड़वा मनाने वाले बहुत से परिवार कहते हैं कि साल के इसी समय ब्रह्मा जी ने सृष्टि की रचना शुरू की थी, और वे इस कथा से एक नई शुरुआत का भाव लेते हैं, जैसे सारा संसार ऊपर उठाकर फिर से नया बना दिया गया हो।

साथ मिलकर करने के लिए

एक कटोरी में पानी भरिए और उस पर एक छोटा-सा पत्ता या कागज़ की नाव "धरती" बनाकर तैराइए। फिर चम्मच से कटोरी की तली से एक कंचा उठाकर देखिए, जैसे वराह ने धरती को उठाया था। उगादि पर साथ मिलकर छह स्वादों की एक छोटी-सी कटोरी बनाइए, जैसे गुड़, इमली, नीम की पत्ती, नमक, मिर्च और कच्चा आम, और बात कीजिए कि नया साल कौन-सी मीठी और कठिन बातें ला सकता है।

उगादि: जिस पर्व से यह कहानी जुड़ी है

और कहानियाँ

बड़ों के लिए

कहानी ऊपर पूरी हुई। यहाँ बड़ों के लिए: परिवार इसे किन दूसरे ढंगों से सुनाते हैं, और यह किन ग्रंथों से ली गई है।

कहानी में क्या अंतर मिलता है, और यह कहाँ से आई

कहानी में क्या अंतर मिलता है

उगादि (आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक में) और गुड़ी पड़वा (महाराष्ट्र में) चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को चांद्र नववर्ष के रूप में मनाए जाते हैं। इस दिन ब्रह्मा जी के सृष्टि-रचना आरंभ करने की मान्यता ब्रह्म पुराण के एक श्लोक से आती है, जिसे पर्वों के नियम बताने वाले मध्यकालीन ग्रंथ, जैसे हेमाद्रि और निर्णयसिंधु, उद्धृत करते हैं; यहाँ सुनाया गया विष्णु पुराण का अध्याय कोई दिन नहीं बताता। परिवार उगादि पचड़ी खाते हैं, जिसमें मीठा, खट्टा, कड़वा और दूसरे स्वाद मिले होते हैं, आने वाले साल के लिए, और महाराष्ट्र में दरवाज़े पर गुड़ी, यानी चमकीले कपड़े वाला डंडा, खड़ी की जाती है। भागवत में और आज की बहुत सी कथाओं में वराह हिरण्याक्ष नाम के दैत्य को भी हराते हैं, जो पृथ्वी को ले गया था; यहाँ सुनाए गए विष्णु पुराण के अध्याय में कोई दैत्य नहीं है।

कहानी कहाँ से आई

  • विष्णु पुराण, पहला अंश, अध्याय 4 (और अध्याय 5 का आरंभ): 1.4 ब्रह्मा के रूप में नारायण का जागना, जल के नीचे पृथ्वी, वराह का रूप, पृथ्वी की प्रार्थना, दाँतों पर पृथ्वी को उठाना, ऋषियों की स्तुति, पृथ्वी को जल पर टिकाना और उसे आकार देना; 1.5 सृष्टि का नया आरंभ
  • विष्णु पुराण, पहला अंश, विल्सन का अंग्रेज़ी अनुवाद (लंदन, 1840): अध्याय 4, पृष्ठ 27–33; अध्याय 5, पृष्ठ 34–35

स्रोत

  • विष्णु पुराण, पहला अंश, अध्याय 4–5, विल्सन का अंग्रेज़ी अनुवाद (1840), पृष्ठ 27–35
  • श्रीमद्भागवत, स्कंध 3, अध्याय 13 और 17–19, मन्मथ नाथ दत्त का अंग्रेज़ी अनुवाद (कलकत्ता, 1895–96), विषय-सूची के अनुसार पृष्ठ 60 और 85–91 (वराह पृथ्वी को उठाते हैं और हिरण्याक्ष से लड़ते हैं): क्षेत्रीय टिप्पणी में बताई दूसरी कथा
  • कमलाकर भट्ट का निर्णयसिंधु, जो अपने अंतिम श्लोकों के अनुसार विक्रम संवत 1668 (1612) में पूरा हुआ (पृष्ठ 476); बंबई, निर्णय सागर प्रेस, जिसे भारत का डिजिटल पुस्तकालय 1901 का बताता है (स्कैन में मुखपृष्ठ नहीं है); दूसरा परिच्छेद, पहला पृष्ठ, पृष्ठ 62: वर्ष चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से आरंभ होता है, और ग्रंथ हेमाद्रि के हवाले से ब्रह्म पुराण का वह श्लोक देता है कि ब्रह्मा ने उसी दिन सूर्योदय पर सृष्टि रची; हवाला, उद्धरण नहीं

परिवारों के प्रश्न

स्रोत और लाइसेंस

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दिए गए स्रोतों से मिलाया गया, 15 अक्टूबर 2026।
अद्यतन
28 अक्टूबर 2026

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