आरती कीजै हनुमान लला की (अर्थ सहित)
पारंपरिक (पुरानी छपाइयों में अंतिम पंक्ति में तुलसीदास या रामानंद का नाम)
आरती कीजै हनुमान लला की (Aarti Kije Hanuman Lala Ki): आरती कीजै हनुमान लला की ("आओ, प्यारे हनुमान की आरती करें") एक आरती है, यानी वह गीत जो भगवान के सामने दीपक घुमाते समय, प्रायः पूजा के अंत में, गाया जाता है। इसमें हनुमान जी की स्तुति दुष्टों का नाश करने वाले और श्रीराम की अपनी शक्ति के अंश के रूप में की गई है। बहुत से परिवार इसे हनुमान चालीसा के बाद गाते हैं, प्रायः मंगलवार या शनिवार को, जो दिन बहुत पहले से हनुमान के माने जाते हैं।
पाठ और अर्थ, पंक्ति-दर-पंक्ति
टेक
आरती कीजै हनुमान ललाकी ।दुष्ट दलन रघुनाथ कलाकी ॥ टेक ॥
Arti kijai hanuman lalakiDusht dalan raghunath kalaki
IAST
āratī kījai hanumāna lalākī |duṣṭa dalana raghunātha kalākī || ṭeka ||
भावार्थ प्यारे बालक (लला) हनुमान जी की आरती कीजिए, यानी पूजा में उनके सामने दीपक घुमाइए। वे दुष्टों का नाश करते हैं और रघुनाथ, यानी श्रीराम, की शक्ति का अंश (कला) हैं। छपाई में इस पंक्ति को टेक कहा गया है; टेक हर पद के बाद फिर गाई जाती है।
English meaning Perform the aarti (wave the lamp in worship) of Hanuman, the dear child (lalā). He destroys the wicked, and he is a part (kalā) of the power of Raghunath, Lord Rama. The printing marks this line as the refrain (ṭek), sung again after each couplet.
6 छपाइयों में पाठभेद
संस्करणों के अंतर। कोई दूसरा मुद्रण या पाठ इस स्थान को अलग ढंग से पढ़ता है।
- शब्द 1900 के कानपुर मुद्रण में पाठ है: आरती कीजै हनुमानजी ललाकी । दुष्ट दलन रघुनाथ कलाकी ॥ टेक ॥ 1900 की आधार छपाई। निर्णय 14 (2026) से दिखाया गया पाठ वह है जिसे इस पाठ को छापने वाले प्रकाशकों से अधिक आज के प्रकाशक छापते हैं (बैच 7 में फिर से गिना गया, रणधीर प्रकाशन को चौथे प्रकाशक के रूप में लेकर); यह छपाई का अपना पाठ है।
- शब्द sanskritdocuments.org के आज के संस्करण में पाठ है: आरति कीजै हनुमान लला की । दुष्ट दलन रघुनाथ कला की ॥ दिखाए गए पाठ से अंतर (शब्द और वर्तनी): 'कलाकी टेक' की जगह 'कला की'।
- शब्द खेमराज श्रीकृष्णदास, बम्बई के आज के संस्करण में पाठ है: आरती कीजै हनुमान ललाकी । दुष्ट दलन रघुनाथ कलाकी ॥ दिखाए गए पाठ से अंतर (शब्द और वर्तनी): 'टेक' नहीं है। पृष्ठ 23।
- शब्द 1913 के बंबई मुद्रण में पाठ है: आरति कीजे हनुमान ललाकी दुष्ट दलन रघुनाथ ललाकी ॥ आरति, कीजे; 'रघुनाथ ललाकी' कलाकी की छपाई की भूल है। पन्ने की छवि पर पढ़ा गया, पृष्ठ 131, स्कैन पन्ना n137।
- शब्द 1923 के काशी (बनारस) मुद्रण में पाठ है: आरति कीजै हनुमान लाल की । दुष्ट दलन रघुनाथ-कला की ॥ लला की जगह लाल (पुत्र, प्यारा); टेक का चिह्न नहीं। 1929 के शब्दसागर में 'हनुमान लला की' और 'दुष्टदलन' है। पन्ने की छवि पर पढ़ा गया, पृष्ठ 341, स्कैन पन्ना n355।
- वर्तनी एक डिजिटल प्रति में पाठ है आज की टेक: वही शब्द।
पद 1
जाके बलसे गिरिवर कांपे ।रोग दोष जाके निकट न झांके ॥१॥
Jake balse girivar kampeRog dosh jake nikat na jhanke
IAST
jāke balase girivara kāṃpe |roga doṣa jāke nikaṭa na jhāṃke ||1||
भावार्थ उनके बल से बड़े-बड़े पर्वत काँप उठते हैं। रोग और दोष उनके पास झाँकते तक नहीं।
English meaning Great mountains tremble at his strength. Disease and harm do not even peep near him.
7 छपाइयों में पाठभेद
संस्करणों के अंतर। कोई दूसरा मुद्रण या पाठ इस स्थान को अलग ढंग से पढ़ता है।
- छपे संस्करण में पाठ है: जाके बलसे गिरिवर कांपे ।
रोग दोष जाके निकट न झांके १ The printing ends the couplet with a bare '१' at the line end; the display writes ॥१॥, as the printing does for couplets 2 to 12. - शब्द गीता प्रेस, गोरखपुर के आज के संस्करण में पाठ है: जाके बल से गिरिवर काँपै । रोग दोष जाके निकट न झाँपै ॥ दिखाए गए पाठ से अंतर (शब्द और वर्तनी): 'झांके' की जगह 'झाँपै'। पीडीएफ़ पृष्ठ 25।
- शब्द खेमराज श्रीकृष्णदास, बम्बई के आज के संस्करण में पाठ है: जाके बलसे गिरिवर कांपे । रोगदोष जाके निकट न झांके ॥ टेक ॥ दिखाए गए पाठ से अंतर (शब्द और वर्तनी): 'टेक' अधिक है। पृष्ठ 23।
- शब्द 1913 के बंबई मुद्रण में पाठ है: जाके बलसे गिरिदर कांपे रोग दोष जाके निकट न झांपे ॥ झांके की जगह झांपे; गिरिदर, गिरिवर की छपाई की भूल है (दूसरी समीक्षा ने पन्ने की छवि पर द पढ़ा)।
- शब्द 1923 के काशी (बनारस) मुद्रण में पाठ है: जाके बल गरने महि काँपे । रोग सोग जाके सिमाँ न चाँपे ॥ 'पृथ्वी (महि) काँपती है'; 'रोग और शोक (सोग) उनकी सीमा (सिमाँ) पर दबाव नहीं डालते'। गरने छपाई की भूल लगती है; 1929 के शब्दसागर में 'बल भर ते' (अपने बल के भार से) है।
- शब्द एक डिजिटल प्रति में पाठ है झांके की जगह झाँपै।
- शब्द रणधीर प्रकाशन, हरिद्वार के आज के संस्करण में पाठ है: जाके बल से गिरवर कांपे । रोग दोष जाके निकट न झांके ॥ दिखाए गए पाठ से अंतर (शब्द और वर्तनी): 'बलसे गिरिवर' की जगह 'बल से गिरवर'। पृष्ठ 32, स्कैन पन्ना n35; पन्ने की छवि पर पढ़ा गया (बैच 7)।
पद 2
अञ्जनी पुत्र महाबलदाई ।संतनके प्रभु सदा सहाई ॥२॥
Anjani putra mahabaldaiSantanke prabhu sada sahai
IAST
añjanī putra mahābaladāī |saṃtanake prabhu sadā sahāī ||2||
भावार्थ माता अंजनी के पुत्र महान बल देने वाले हैं। वे संतों के प्रभु (श्रीराम) के सदा सहायक हैं; इस पंक्ति का एक अर्थ यह भी किया जाता है कि वे संतों के प्रभु हैं और सदा उनकी सहायता करते हैं।
English meaning The son of Anjani gives great strength. He is always the helper of the saints' Lord, Rama; the line is also read as "the Lord who always helps the saints".
5 छपाइयों में पाठभेद
संस्करणों के अंतर। कोई दूसरा मुद्रण या पाठ इस स्थान को अलग ढंग से पढ़ता है।
- शब्द sanskritdocuments.org के आज के संस्करण में पाठ है: अंजनि पुत्र महा बलदायी । संतन के प्रभु सदा सहायी ॥ दिखाए गए पाठ से अंतर (शब्द और वर्तनी): 'महाबलदाई संतनके' की जगह 'महा बलदायी संतन के'; 'सहाई' की जगह 'सहायी'।
- वर्तनी 1913 के बंबई मुद्रण में पाठ है: अंजनि पुत्र महाबल दाई॥ सन्तनके प्रभु सदा सहाई॥
- शब्द 1923 के काशी (बनारस) मुद्रण में पाठ है: अंजनी-सुत महाबल-दायक । साधु संत पर सदा सहायक ॥ 'अंजनी के पुत्र, महान बल देने वाले, साधुओं और संतों के सदा सहायक'।
- वर्तनी एक डिजिटल प्रति में पाठ है
- शब्द रणधीर प्रकाशन, हरिद्वार के आज के संस्करण में पाठ है: अंजनी पुत्र महा बलदाई । सन्तन के प्रभु सदा सहाई ॥ दिखाए गए पाठ से अंतर (शब्द और वर्तनी): 'अञ्जनी' की जगह 'अंजनी'; 'महाबलदाई संतनके' की जगह 'महा बलदाई सन्तन के'। पृष्ठ 32, स्कैन पन्ना n35; पन्ने की छवि पर पढ़ा गया (बैच 7)।
पद 3
दे वीरा रघुनाथ पठाये ।लङ्का जारि सिया सुधि लाये ॥३॥
De vira raghunath pathayeLanka jari siya sudhi laye
IAST
de vīrā raghunātha paṭhāye |laṅkā jāri siyā sudhi lāye ||3||
भावार्थ रघुनाथ (श्रीराम) ने उन्हें बीड़ा देकर भेजा। बीड़ा पान का वह बीड़ा है जो कठिन काम उठाने वाले को दिया जाता है। उन्होंने लंका जलाई और सीता जी की खबर ले आए।
English meaning Raghunath (Rama) gave him the bīṛā, the rolled betel leaf handed to the one who takes up a hard task, and sent him off. He burned Lanka and brought back news of Sita.
6 छपाइयों में पाठभेद
संस्करणों के अंतर। कोई दूसरा मुद्रण या पाठ इस स्थान को अलग ढंग से पढ़ता है।
- शब्द गीता प्रेस, गोरखपुर के आज के संस्करण में पाठ है: दे बीरा रघुनाथ पठाये । लंका जारि सीय सुधि लाये ॥ दिखाए गए पाठ से अंतर (शब्द और वर्तनी): 'सिया' की जगह 'सीय'। पीडीएफ़ पृष्ठ 25।
- शब्द sanskritdocuments.org के आज के संस्करण में पाठ है: दे बीड़ा रघुनाथ पठाये । लंका जाय सिया सुधि लाये ॥ दिखाए गए पाठ से अंतर (शब्द और वर्तनी): 'वीरा' की जगह 'बीड़ा'; 'जारि' की जगह 'जाय'।
- वर्तनी 1913 के बंबई मुद्रण में पाठ है: दे बीरा रघुनाथ पठाये ॥ लंका जारि सिया सुध लाये ॥ बीरा (ब के साथ), सुध।
- लोप 1923 के काशी (बनारस) मुद्रण में पाठ है: — रामानंद वाले रूप में ऐसा कोई दोहा नहीं है (1923 और 1929)।
- वर्तनी एक डिजिटल प्रति में पाठ है बीरा, सिया की जगह सीय।
- शब्द रणधीर प्रकाशन, हरिद्वार के आज के संस्करण में पाठ है: दे बीड़ा रघुनाथ पठाये । लंका जारि सिया सुधि लाये ॥ दिखाए गए पाठ से अंतर (शब्द और वर्तनी): 'वीरा' की जगह 'बीड़ा'; 'लङ्का' की जगह 'लंका'। पृष्ठ 32, स्कैन पन्ना n35; पन्ने की छवि पर पढ़ा गया (बैच 7)।
पद 4
लङ्का सो कोट समुद्र सी खाई ।जात पवनसुत बार न लाई ॥४॥
Lanka so kot samudra si khaiJat pavansut bar na lai
IAST
laṅkā so koṭa samudra sī khāī |jāta pavanasuta bāra na lāī ||4||
भावार्थ लंका एक किला थी, और उसके चारों ओर का समुद्र उसकी खाई था। फिर भी पवनपुत्र को वहाँ जाने में ज़रा भी देर नहीं लगी।
English meaning Lanka was a fort, and the sea around it was its moat. Yet the son of the wind took no time at all to go there.
6 छपाइयों में पाठभेद
संस्करणों के अंतर। कोई दूसरा मुद्रण या पाठ इस स्थान को अलग ढंग से पढ़ता है।
- शब्द 1900 के कानपुर मुद्रण में पाठ है: लङ्का ऐसे कोट समुद्र ऐसी खाई । जात पवनसुत बार न लाई ॥४॥ 1900 की आधार छपाई। निर्णय 14 (2026) से दिखाया गया पाठ वह है जिसे इस पाठ को छापने वाले प्रकाशकों से अधिक आज के प्रकाशक छापते हैं (बैच 7 में फिर से गिना गया, रणधीर प्रकाशन को चौथे प्रकाशक के रूप में लेकर); यह छपाई का अपना पाठ है।
- शब्द sanskritdocuments.org के आज के संस्करण में पाठ है: लंका सौ कोटि समुद्र सी खाई । जात पवनसुत बार न लाई ॥ दिखाए गए पाठ से अंतर (शब्द और वर्तनी): 'कोट' की जगह 'कोटि'।
- शब्द खेमराज श्रीकृष्णदास, बम्बई के आज के संस्करण में पाठ है: लङ्का ऐसे कोट समुद्र ऐसी खाई । जात पवनसुत वार न लाई ॥ दिखाए गए पाठ से अंतर (शब्द और वर्तनी): 'सो' की जगह 'ऐसे'; 'सी' की जगह 'ऐसी'। पृष्ठ 23।
- शब्द 1913 के बंबई मुद्रण में पाठ है: लंकासा कोट समुद्र सीखाई ॥ जात पवन सुत बार न लाई ॥ 'लंका-सा कोट, समुद्र-सी खाई' ('लंका जैसा किला, समुद्र जैसी खाई'), आज के शब्दों के निकट।
- शब्द 1923 के काशी (बनारस) मुद्रण में पाठ है: लंका कोट समुंदर खाई । जात पवनसुत बार न लाई ॥ 'लंका किला, समुद्र खाई'। 1929 के शब्दसागर में 'लंकाकोट समुंदर खाई' है।
- शब्द एक डिजिटल प्रति में पाठ है आज की पंक्ति: लङ्का ऐसे … ऐसी की जगह लंका-सो … समुद्र-सी।
पद 5
लङ्का जारि असुर सब मारे ।सीता रामजीके काजसँवारे ॥५॥
Lanka jari asur sab mareSita ramjike kajsanvare
IAST
laṅkā jāri asura saba māre |sītā rāmajīke kājasam̐vāre ||5||
भावार्थ उन्होंने लंका जलाई और सब राक्षसों को मारा, और सीता-राम जी के काम सँवारे।
English meaning He burned Lanka and killed all the demons, and he carried out the work of Sita and Rama.
6 छपाइयों में पाठभेद
संस्करणों के अंतर। कोई दूसरा मुद्रण या पाठ इस स्थान को अलग ढंग से पढ़ता है।
- शब्द sanskritdocuments.org के आज के संस्करण में पाठ है: लंका जारि असुर संघारे । सिया रामजी के काज संवारे ॥ दिखाए गए पाठ से अंतर (शब्द और वर्तनी): 'लङ्का' की जगह 'लंका'; 'सब मारे सीता रामजीके काजसँवारे' की जगह 'संघारे सिया रामजी के काज संवारे'।
- शब्द 1913 के बंबई मुद्रण में पाठ है: लंका जारि असुर सब मारे ॥ सीतारामजीके काज सम्हारे ॥ सँवारे की जगह सम्हारे ('सँभाले')।
- शब्द 1923 के काशी (बनारस) मुद्रण में पाठ है: लंक प्रजारि असुर सब मार्यो । राजा रामजि के काज सँवार्यो ॥ 'राजा राम का काम'; भूतकाल -यो वाले रूप में।
- शब्द एक डिजिटल प्रति में पाठ है सब मारे की जगह संहारे ('संहार किया')।
- शब्द रणधीर प्रकाशन, हरिद्वार के आज के संस्करण में पाठ है: लंका जारि असुरि सब मारे । सीता रामजी के काज संवारे ॥ दिखाए गए पाठ से अंतर (शब्द और वर्तनी): 'लङ्का' की जगह 'लंका'; 'असुर' की जगह 'असुरि'। पृष्ठ 32, स्कैन पन्ना n35; पन्ने की छवि पर पढ़ा गया (बैच 7)।
- शब्द गीता प्रेस, गोरखपुर के आज के संस्करण में पाठ है: लंका जारि असुर संहारे । सिया रामजी के काज सँवारे ॥ दिखाए गए पाठ से अंतर (शब्द और वर्तनी): 'लङ्का' की जगह 'लंका'; 'सब मारे सीता रामजीके काजसँवारे' की जगह 'संहारे सिया रामजी के काज सँवारे'। पीडीएफ़ पृष्ठ 25।
पद 6
लक्ष्मण मूर्छित पड़े धरणीमें ।आनि सजीवन प्राण उबारे ॥६॥
Lakshman murchhit pare dharnimenAni sajivan pran ubare
IAST
lakṣmaṇa mūrchita paṛe dharaṇīmeṃ |āni sajīvana prāṇa ubāre ||6||
भावार्थ जब लक्ष्मण मूर्छित होकर धरती पर पड़े थे, तब हनुमान जी संजीवनी बूटी ले आए और उनके प्राण बचाए।
English meaning When Lakshmana lay unconscious on the ground, Hanuman brought the sanjīvan, the herb of life, and saved his life.
8 छपाइयों में पाठभेद
संस्करणों के अंतर। कोई दूसरा मुद्रण या पाठ इस स्थान को अलग ढंग से पढ़ता है।
- शब्द 1900 के कानपुर मुद्रण में पाठ है: लक्ष्मण मुरछिपरे धरणीमें । आनि सजीवन प्राण उबारे ॥६॥ 1900 की आधार छपाई। निर्णय 14 (2026) से दिखाया गया पाठ वह है जिसे इस पाठ को छापने वाले प्रकाशकों से अधिक आज के प्रकाशक छापते हैं (बैच 7 में फिर से गिना गया, रणधीर प्रकाशन को चौथे प्रकाशक के रूप में लेकर); यह छपाई का अपना पाठ है।
- शब्द sanskritdocuments.org के आज के संस्करण में पाठ है: लक्ष्मण मूर्छित पड़े सकारे । आन संजीवन प्राण उबारे ॥ दिखाए गए पाठ से अंतर (शब्द और वर्तनी): 'धरणीमें आनि सजीवन' की जगह 'सकारे आन संजीवन'।
- शब्द खेमराज श्रीकृष्णदास, बम्बई के आज के संस्करण में पाठ है: लक्ष्मण मुरछि परे धरणीमें । आन संजीबन प्राण उबारे ॥ दिखाए गए पाठ से अंतर (शब्द और वर्तनी): 'मूर्छित पड़े' की जगह 'मुरछि परे'; 'आनि सजीवन' की जगह 'आन संजीबन'। पृष्ठ 23–24।
- शब्द 1913 के बंबई मुद्रण में पाठ है: लक्ष्मण मूर्छि परे धरणी में॥ आन सभीजन प्राण उबारे॥ मूर्छि; 'सभीजन' सजीवन की छपाई की भूल है।
- शब्द 1923 के काशी (बनारस) मुद्रण में पाठ है: लछिमन धरनि में मूर्छि पर्यो । … आनि सजीवन प्रान उबार्यो । वही दोनों आधे भाग, रामानंद वाले रूप के दो दोहों में (पंक्ति 5 और 6), हर एक के साथ एक दूसरा आधा भाग: 'पैठि पताल जमकातर तोर्यो' और 'मही सबन कै भुजा उपार्यो'।
- शब्द एक डिजिटल प्रति में पाठ है 'मुरछिपरे धरणीमें' की जगह 'मूर्छित पड़े सकारे' ('सुबह तक मूर्छित पड़े रहे')।
- शब्द रणधीर प्रकाशन, हरिद्वार के आज के संस्करण में पाठ है: लक्ष्मण मूर्छित पड़े धरणी में । लाये संजीवन प्राण उबारे ॥ दिखाए गए पाठ से अंतर (शब्द और वर्तनी): 'धरणीमें आनि सजीवन' की जगह 'धरणी में लाये संजीवन'। पृष्ठ 32, स्कैन पन्ना n35; पन्ने की छवि पर पढ़ा गया (बैच 7)।
- शब्द गीता प्रेस, गोरखपुर के आज के संस्करण में पाठ है: लक्ष्मण मूर्छित पड़े सकारे । आनि सजीवन प्रान उबारे ॥ दिखाए गए पाठ से अंतर (शब्द और वर्तनी): 'धरणीमें' की जगह 'सकारे'; 'प्राण' की जगह 'प्रान'। पीडीएफ़ पृष्ठ 25।
पद 7
पैठि पताल तोरि यम कारे ।अहिरावन की भुजाउखारे ॥७॥
Paithi patal tori yam kareAhiravan ki bhujaukhare
IAST
paiṭhi patāla tori yama kāre |ahirāvana kī bhujāukhāre ||7||
भावार्थ वे पाताल में घुसे, "यम कारे" को तोड़ा (इसे यम के बंधन भी पढ़ा जाता है और यम जैसे काले, घातक राक्षस रक्षक भी), और पाताल के राक्षस राजा अहिरावण की भुजाएँ उखाड़ दीं। (1900 की छपाई में "यमकातर", यानी यम की कटार, है।)
English meaning He entered the underworld (pātāl), broke "yam kāre" (read either as Yama's bonds or as demon guards dark and deadly as Yama, the god of death), and tore out the arms of Ahiravan, the demon king of the underworld. (The 1900 printing has "yamkātar", "Yama's blade".)
8 छपाइयों में पाठभेद
संस्करणों के अंतर। कोई दूसरा मुद्रण या पाठ इस स्थान को अलग ढंग से पढ़ता है।
- शब्द 1900 के कानपुर मुद्रण में पाठ है: पैठि पताल तोरि यमकातर । अहिरावनके भुजाउखारे ॥७॥ 1900 की आधार छपाई। निर्णय 14 (2026) से दिखाया गया पाठ वह है जिसे इस पाठ को छापने वाले प्रकाशकों से अधिक आज के प्रकाशक छापते हैं (बैच 7 में फिर से गिना गया, रणधीर प्रकाशन को चौथे प्रकाशक के रूप में लेकर); यह छपाई का अपना पाठ है।
- शब्द गीता प्रेस, गोरखपुर के आज के संस्करण में पाठ है: पैठि पताल तोरि जम कारे । अहिरावन की भुजा उखारे ॥ दिखाए गए पाठ से अंतर (शब्द और वर्तनी): 'यम' की जगह 'जम'। पीडीएफ़ पृष्ठ 25।
- शब्द sanskritdocuments.org के आज के संस्करण में पाठ है: पैठि पाताल तोड़ि यम कारे । अहिरावन की भुजा उखारे ॥ दिखाए गए पाठ से अंतर (शब्द और वर्तनी): 'पताल तोरि' की जगह 'पाताल तोड़ि'।
- शब्द खेमराज श्रीकृष्णदास, बम्बई के आज के संस्करण में पाठ है: पैठि पताल तोरि यमकातर । अहिरावणके भुजा उखारे ॥ दिखाए गए पाठ से अंतर (शब्द और वर्तनी): 'यम कारे अहिरावन की भुजाउखारे' की जगह 'यमकातर अहिरावणके भुजा उखारे'। पृष्ठ 24।
- शब्द 1913 के बंबई मुद्रण में पाठ है: बैठि पताल कीन यम कातर॥ अहिरावणके भुजा उखारे ॥ 'तोरि यमकातर' की जगह 'कीन यम कातर' ('यम को डरा दिया'?); पैठि की जगह बैठि, शायद छपाई की भूल।
- शब्द 1923 के काशी (बनारस) मुद्रण में पाठ है: पैठि पताल जमकातर तोर्यो । … मही सबन कै भुजा उपार्यो ॥ रामानंद वाले रूप में जिनकी भुजाएँ उखाड़ी गईं वे अहिरावण की नहीं, मही (मही) और उसके लोगों की हैं।
- शब्द एक डिजिटल प्रति में पाठ है 'तोरि यमकातर' की जगह 'तोरि जम-कारे' ('यम के बंधन तोड़े')।
- शब्द रणधीर प्रकाशन, हरिद्वार के आज के संस्करण में पाठ है: पैठि पाताल तोरि जम कारे । अहिरावण की भुजा उखारे ॥ दिखाए गए पाठ से अंतर (शब्द और वर्तनी): 'पताल' की जगह 'पाताल'; 'यम' की जगह 'जम'; 'अहिरावन' की जगह 'अहिरावण'। पृष्ठ 32, स्कैन पन्ना n35; पन्ने की छवि पर पढ़ा गया (बैच 7)।
पद 8
बायें भुजा असुर संहारे ।दहिने भुजा सब संतउबारे ॥८॥
Bayen bhuja asur sanhareDahine bhuja sab santaubare
IAST
bāyeṃ bhujā asura saṃhāre |dahine bhujā saba saṃtaübāre ||8||
भावार्थ बाईं भुजा से उन्होंने राक्षसों का संहार किया और दाहिनी भुजा से सब संतों को बचाया। 1900 की छपाई में दूसरे भाग में "मुजा" छपा है, जो "भुजा" की भूल है; पहले भाग में "भुजा" ही छपा है।
English meaning With his left arm he destroyed the demons, and with his right arm he saved all the saints. The 1900 printing has "mujā" in the second half, a misprint for "bhujā" (arm), which it prints in the first half.
8 छपाइयों में पाठभेद
संस्करणों के अंतर। कोई दूसरा मुद्रण या पाठ इस स्थान को अलग ढंग से पढ़ता है।
- शब्द 1900 के कानपुर मुद्रण में पाठ है: बायें भुजा सब असुर संहारे । दहिने मुजा सब संतउबारे ॥८॥ 1900 की आधार छपाई। निर्णय 14 (2026) से दिखाया गया पाठ वह है जिसे इस पाठ को छापने वाले प्रकाशकों से अधिक आज के प्रकाशक छापते हैं (बैच 7 में फिर से गिना गया, रणधीर प्रकाशन को चौथे प्रकाशक के रूप में लेकर); यह छपाई का अपना पाठ है।
- शब्द sanskritdocuments.org के आज के संस्करण में पाठ है: बाँये भुजा असुर दल मारे । दाहिने भुजा संत जन तारे ॥ दिखाए गए पाठ से अंतर (शब्द और वर्तनी): 'बायें' की जगह 'बाँये'; 'संहारे दहिने' की जगह 'दल मारे दाहिने'; 'सब संतउबारे' की जगह 'संत जन तारे'।
- शब्द खेमराज श्रीकृष्णदास, बम्बई के आज के संस्करण में पाठ है: बाँए भुजा असुर संहारे । दहिने भुजा सब सन्त उबारे ॥ दिखाए गए पाठ से अंतर (शब्द और वर्तनी): 'बायें' की जगह 'बाँए'; 'संतउबारे' की जगह 'सन्त उबारे'। पृष्ठ 24।
- शब्द 1913 के बंबई मुद्रण में पाठ है: दाम भुजा सब असुर संहारे ॥ दक्षिण भुज से संत उबारे ॥ 'दाम' (बाम की छपाई की भूल, जैसी छपी है वैसी रखी गई); दक्षिण भुज से ('दाहिनी भुजा से')।
- वर्तनी 1923 के काशी (बनारस) मुद्रण में पाठ है: बाँएँ भुजा सब असुर सँघारी । दहिन भुजा सब संत उबारी ॥
- शब्द एक डिजिटल प्रति में पाठ है 'असुरदल मारे' ('असुरों की सेनाएँ मारीं'), 'संतजन तारे' ('संतों को पार लगाया')।
- शब्द रणधीर प्रकाशन, हरिद्वार के आज के संस्करण में पाठ है: बाईं भुजा असुर संहारे । दाईं भुजा सब सन्त उबारे ॥ दिखाए गए पाठ से अंतर (शब्द और वर्तनी): 'बायें' की जगह 'बाईं'; 'दहिने' की जगह 'दाईं'; 'संतउबारे' की जगह 'सन्त उबारे'। पृष्ठ 32, स्कैन पन्ना n35; पन्ने की छवि पर पढ़ा गया (बैच 7)।
- शब्द गीता प्रेस, गोरखपुर के आज के संस्करण में पाठ है: बायें भुजा असुर दल मारे । दहिने भुजा संत जन तारे ॥ दिखाए गए पाठ से अंतर (शब्द और वर्तनी): 'संहारे' की जगह 'दल मारे'; 'सब संतउबारे' की जगह 'संत जन तारे'। पीडीएफ़ पृष्ठ 25।
पद 9
सुर नर मुनि जन आरति उतारें ।जै जै जै हनुमान उचारें ॥९॥
Sur nar muni jan arati utarenJai jai jai hanuman ucharen
IAST
sura nara muni jana ārati utāreṃ |jai jai jai hanumāna ucāreṃ ||9||
भावार्थ देवता, मनुष्य और मुनि उनकी आरती उतारते हैं और "जय जय जय हनुमान" बोलते हैं।
English meaning Gods, people and sages wave the lamp before him, and call out "Victory, victory, victory to Hanuman".
8 छपाइयों में पाठभेद
संस्करणों के अंतर। कोई दूसरा मुद्रण या पाठ इस स्थान को अलग ढंग से पढ़ता है।
- शब्द 1900 के कानपुर मुद्रण में पाठ है: सुर नर मुनि जन आरति उतारें । जै जै जै हनुमानजी उचारें ॥९॥ 1900 की आधार छपाई। निर्णय 14 (2026) से दिखाया गया पाठ वह है जिसे इस पाठ को छापने वाले प्रकाशकों से अधिक आज के प्रकाशक छापते हैं (बैच 7 में फिर से गिना गया, रणधीर प्रकाशन को चौथे प्रकाशक के रूप में लेकर); यह छपाई का अपना पाठ है।
- शब्द गीता प्रेस, गोरखपुर के आज के संस्करण में पाठ है: सुर नर मुनि आरती उतारे । जै जै जै हनुमान उचारे ॥ दिखाए गए पाठ से अंतर (शब्द और वर्तनी): 'जन' नहीं है। पीडीएफ़ पृष्ठ 25।
- शब्द sanskritdocuments.org के आज के संस्करण में पाठ है: सुर नर मुनि जन आरति उतारे । जय जय जय हनुमान उचारे ॥ दिखाए गए पाठ से अंतर (शब्द और वर्तनी): 'जै जै जै' की जगह 'जय जय जय'।
- शब्द खेमराज श्रीकृष्णदास, बम्बई के आज के संस्करण में पाठ है: सुर नर मुनि जन आरति उतारे । जै जै जै हनुमान्जी उचारे ॥ दिखाए गए पाठ से अंतर (शब्द और वर्तनी): 'हनुमान' की जगह 'हनुमान्जी'। पृष्ठ 24।
- शब्द 1913 के बंबई मुद्रण में पाठ है: सुर नर मुनि आरती उतारे ॥ जय जंय जय जय हनुमान उचारे ॥ जन नहीं; चार बार जय।
- शब्द 1923 के काशी (बनारस) मुद्रण में पाठ है: सुरनर मुनि सब करही आरती । जै जै जै हनुमानलाल की ॥ रामानंद वाले रूप की अंतिम पंक्ति: 'देवता, लोग और मुनि सब आरती करते हैं; प्यारे हनुमान की जय'।
- शब्द एक डिजिटल प्रति में पाठ है
- शब्द रणधीर प्रकाशन, हरिद्वार के आज के संस्करण में पाठ है: सुर नर मुनि जन आरती उतारें । जय जय जय हनुमान उचारें ॥ दिखाए गए पाठ से अंतर (शब्द और वर्तनी): 'आरति' की जगह 'आरती'; 'जै जै जै' की जगह 'जय जय जय'। पृष्ठ 32, स्कैन पन्ना n35; पन्ने की छवि पर पढ़ा गया (बैच 7)।
पद 10
कञ्चनथार कपूर की बाती ।आरति करत अंजना माई ॥१०॥
Kanchanthar kapur ki batiArati karat anjana mai
IAST
kañcanathāra kapūra kī bātī |ārati karata aṃjanā māī ||10||
भावार्थ सोने की थाली में कपूर की बाती लेकर माता अंजना उनकी आरती करती हैं।
English meaning With a golden plate and a wick of camphor, mother Anjana waves the lamp before him.
7 छपाइयों में पाठभेद
संस्करणों के अंतर। कोई दूसरा मुद्रण या पाठ इस स्थान को अलग ढंग से पढ़ता है।
- शब्द 1900 के कानपुर मुद्रण में पाठ है: कञ्चनथार कपूर की बाती । आरति करत अञ्जनीमाई ॥१०॥ 1900 की आधार छपाई। निर्णय 14 (2026) से दिखाया गया पाठ वह है जिसे इस पाठ को छापने वाले प्रकाशकों से अधिक आज के प्रकाशक छापते हैं (बैच 7 में फिर से गिना गया, रणधीर प्रकाशन को चौथे प्रकाशक के रूप में लेकर); यह छपाई का अपना पाठ है।
- शब्द sanskritdocuments.org के आज के संस्करण में पाठ है: कंचन थार कपूर लौ छाई । आरती करति अंजना माई ॥ दिखाए गए पाठ से अंतर (शब्द और वर्तनी): 'कञ्चनथार' की जगह 'कंचन थार'; 'की बाती आरति करत' की जगह 'लौ छाई आरती करति'।
- शब्द खेमराज श्रीकृष्णदास, बम्बई के आज के संस्करण में पाठ है: कञ्चनथार कपूरकी बाती । करत अञ्जनी माइ आरती ॥ दिखाए गए पाठ से अंतर (शब्द और वर्तनी): 'आरति' नहीं है; 'अंजना माई' की जगह 'अञ्जनी माइ आरती'। पृष्ठ 24।
- वर्तनी 1913 के बंबई मुद्रण में पाठ है: कंचन थार कपूरकी बाती॥ आरति करत अंजनी माई ॥
- लोप 1923 के काशी (बनारस) मुद्रण में पाठ है: — रामानंद वाले रूप में ऐसा कोई दोहा नहीं है; उसकी जगह उसमें 'घंटा ताल झालरी बाजै । जगमग जोति अवधपुर छाजै ॥' है (घंटे, ताल और झालर बजते हैं; अयोध्या पर ज्योति जगमगाती है)।
- शब्द एक डिजिटल प्रति में पाठ है 'कपूर लौ छाई' ('कपूर की लौ फैलती है'), अंजना।
- शब्द गीता प्रेस, गोरखपुर के आज के संस्करण में पाठ है: कंचन थार कपूर लौ छाई । आरति करत अंजना माई ॥ दिखाए गए पाठ से अंतर (शब्द और वर्तनी): 'कञ्चनथार' की जगह 'कंचन थार'; 'की बाती' की जगह 'लौ छाई'। पीडीएफ़ पृष्ठ 25।
पद 11
जो हनुमानजीकी आरति गावें ।वसि वैकुंठ अमर पद पावें ॥११॥
Jo hanumanjiki arati gavenVasi vaikunth amar pad paven
IAST
jo hanumānajīkī ārati gāveṃ |vasi vaikuṃṭha amara pada pāveṃ ||11||
भावार्थ आरती कहती है कि जो हनुमान जी की यह आरती गाते हैं, वे वैकुंठ (विष्णु के धाम) में बसते हैं और अमर पद पाते हैं। ये पाठ के अपने शब्द हैं।
English meaning The aarti says that those who sing this aarti of Hanuman will dwell in Vaikuntha, the heaven of Vishnu, and reach the deathless state. These are the text's own words.
फल की यह बात पाठ की अपनी है; पूजादीप इसका कोई वादा नहीं करता।
7 छपाइयों में पाठभेद
संस्करणों के अंतर। कोई दूसरा मुद्रण या पाठ इस स्थान को अलग ढंग से पढ़ता है।
- शब्द खेमराज श्रीकृष्णदास, बम्बई के आज के संस्करण में पाठ है: जो हनुमान्जीकी आरति गाये । बसि वैकुण्ठ अमर पद पावे ॥ दिखाए गए पाठ से अंतर (शब्द और वर्तनी): 'हनुमानजीकी' की जगह 'हनुमान्जीकी'; 'गावें वसि वैकुंठ' की जगह 'गाये बसि वैकुण्ठ'; 'पावें' की जगह 'पावे'। पृष्ठ 24।
- वर्तनी 1913 के बंबई मुद्रण में पाठ है: जो हनुमानजी की आरति गावे ॥ बसि वैकुण्ठ अमर पद पावे ॥ 1900 के वसि की जगह ब के साथ बसि; वही शब्द ('बसकर'), और वही ह्रस्व स्वर।
- शब्द 1923 के काशी (बनारस) मुद्रण में पाठ है: जो हनुमानजि की आरति गावै । बसि बैकुंठ परम पद पावै ॥ अमर पद की जगह परम पद ('सबसे ऊँचा पद')।
- शब्द एक डिजिटल प्रति में पाठ है बसि, परम पद।
- शब्द रणधीर प्रकाशन, हरिद्वार के आज के संस्करण में पाठ है: जो हनुमान जी की आरती गावैं । बसि बैकुन्ठ अमर पद पावैं ॥ दिखाए गए पाठ से अंतर (शब्द और वर्तनी): 'हनुमानजीकी आरति गावें वसि वैकुंठ' की जगह 'हनुमान जी की आरती गावैं बसि बैकुन्ठ'; 'पावें' की जगह 'पावैं'। पृष्ठ 32, स्कैन पन्ना n35; पन्ने की छवि पर पढ़ा गया (बैच 7)।
- शब्द गीता प्रेस, गोरखपुर के आज के संस्करण में पाठ है: जो हनुमान जी की आरति गावै । बसि बैकुंठ परम पद पावै ॥ दिखाए गए पाठ से अंतर (शब्द और वर्तनी): 'गावें वसि वैकुंठ अमर' की जगह 'गावै बसि बैकुंठ परम'; 'पावें' की जगह 'पावै'। पीडीएफ़ पृष्ठ 25।
- शब्द sanskritdocuments.org के आज के संस्करण में पाठ है: जो हनुमान जी की आरति गावे । बसि वैकुण्ठ परम पद पावे ॥ दिखाए गए पाठ से अंतर (शब्द और वर्तनी): 'गावें वसि वैकुंठ अमर' की जगह 'गावे बसि वैकुण्ठ परम'; 'पावें' की जगह 'पावे'।
पद 12
लङ्कविध्वंस किये रघुराई ।तुलसीदास स्वामी कीरति गाई ॥१२॥
Lankavidhwans kiye raghuraiTulsidas swami kirati gai
IAST
laṅkavidhvaṃsa kiye raghurāī |tulasīdāsa svāmī kīrati gāī ||12||
भावार्थ रघुराई (श्रीराम) ने लंका का विध्वंस किया। स्वामी तुलसीदास ने उनकी कीर्ति गाई। (यहाँ "स्वामी" गाने वाले की उपाधि है; कुछ लोग इसका अर्थ "अपने स्वामी की" भी करते हैं।) यह पंक्ति गाने वाले का नाम बताती है; 1900 की छपाई में है कि उन्होंने यह आरती गाई, और आरती के एक दूसरे पुराने रूप में यहाँ स्वामी रामानंद का नाम है।
English meaning Raghurai, Lord Rama, destroyed Lanka. Swami Tulsidas sang his glory (kīrti). (Swāmī, "master", is a title of the singer here; some read it as "to his master".) This line names the singer; the 1900 printing says he sang this aarti, and another old form of the aarti names Swami Ramanand here instead.
6 छपाइयों में पाठभेद
संस्करणों के अंतर। कोई दूसरा मुद्रण या पाठ इस स्थान को अलग ढंग से पढ़ता है।
- शब्द 1900 के कानपुर मुद्रण में पाठ है: लङ्कविध्वंस किये रघुराई । तुलसीदास स्वामी आरतिगाई ॥१२॥ 1900 की आधार छपाई। निर्णय 14 (2026) से दिखाया गया पाठ वह है जिसे इस पाठ को छापने वाले प्रकाशकों से अधिक आज के प्रकाशक छापते हैं (बैच 7 में फिर से गिना गया, रणधीर प्रकाशन को चौथे प्रकाशक के रूप में लेकर); यह छपाई का अपना पाठ है।
- लोप गीता प्रेस, गोरखपुर के आज के संस्करण में पाठ है: (omitted) गीता प्रेस में यह दोहा नहीं है। पीडीएफ़ पृष्ठ 25।
- लोप sanskritdocuments.org के आज के संस्करण में पाठ है: (omitted) संस्कृत डॉक्यूमेंट्स में यह दोहा नहीं है।
- वर्तनी 1913 के बंबई मुद्रण में पाठ है: लंका ध्वंश कीन रघुराई ॥ तुलसीदास स्वामी आरति गाई ॥ विध्वंस किये की जगह ध्वंश कीन।
- शब्द 1923 के काशी (बनारस) मुद्रण में पाठ है: लंक बिधंस कियो रघुराई । रामानंद (स्वामी) आरती गाई ॥ तुलसीदास की जगह रामानंद का नाम लेता है; 1929 का शब्दसागर भी ऐसा ही करता है।
- लोप एक डिजिटल प्रति में पाठ है आज के पाठ में गाने वाले का नाम लेने वाला कोई दोहा नहीं है।
हिंदी पाठ: पढ़ने के लिए तैयार पाठ, जो आज के संस्करणों से मिलाया गया है। पुराना प्रमाण: 1900 का कानपुर मुद्रण। अर्थ: पूजादीप के लिए लिखे और जाँचे गए। स्रोत और बदलाव
आरती कीजै हनुमान लला की के बारे में
इस आरती में रामायण के हनुमान के कार्यों का स्मरण है: श्रीराम उन्हें बीड़ा देकर भेजते हैं, यानी पान का वह बीड़ा जो कठिन काम उठाने वाले को दिया जाता है; वे सीता की खबर लाते हैं और लंका जलाते हैं; लक्ष्मण के मूर्छित होने पर संजीवनी लाते हैं; और पाताल में जाकर अहिरावण की भुजाएँ उखाड़ते हैं।
सबसे पुरानी जो छपाई मिली, वह कानपुर में संवत 1957 (1900–01) में छपे भक्ति-पुस्तकों का एक संग्रह है, जिसमें टेक और बारह दोहरी पंक्तियाँ हैं; 1913 की बंबई की एक पुस्तक में भी यही पंक्तियाँ हैं। वही इस पाठ का स्रोत है। जहाँ आज की छपाइयाँ आपस में मिलती हैं, वहाँ शब्द वैसे दिए गए हैं जैसे आज अधिकतर परिवार गाते हैं: जैसे "लंका सो कोट समुद्र सी खाई", जहाँ 1900 में "लङ्का ऐसे कोट समुद्र ऐसी खाई" है; जहाँ भी अंतर है, 1900 का पाठ उस पंक्ति के नीचे दिखाया गया है। अंतिम पंक्ति, जिसमें गाने वाले का नाम है, पुरानी छपाइयों में और आज की कुछ छपाइयों में है, पर सब में नहीं।
दोनों पुरानी छपाइयों के अंत में रामचरितमानस के कवि तुलसीदास का नाम है। इसी आरती का एक छोटा रूप, जो काशी में 1923–24 में और फिर 1929 में छपा, स्वामी रामानंद के नाम से समाप्त होता है और उसमें दो पंक्तियाँ ऐसी हैं जो और कहीं नहीं मिलतीं। गीत के बाहर कोई प्रमाण नहीं मिला जो तय करे कि इसे किसने रचा, इसलिए आरती को पारंपरिक बताया गया है।
उच्चारण कैसे करें
गाते समय शब्द के अंत का छोटा "अ" प्रायः नहीं बोला जाता ("हनुमान्"), पर IAST पंक्ति में हर स्वर वैसे ही लिखा है जैसे वर्तनी में है। 1900 की छपाई छोटे शब्दों को पिछले शब्द से जोड़कर लिखती है ("ललाकी", "रामजीके"); गाते समय ये अलग बोले जाते हैं ("लला की", "रामजी के")। "लङ्का" और "लंका" एक ही शब्द हैं। "॥ टेक ॥" टेक का चिह्न है; टेक हर पद के बाद फिर गाई जाती है।
वे पर्व, जिनकी मार्गदर्शिका में इस प्रार्थना का नाम है
हनुमान जी की और प्रार्थनाएँ तथा सुंदरकांड
संबंधित
परिवारों के प्रश्न
आरती कीजै हनुमान लला की किसने लिखी?
पारंपरिक (पुरानी छपाइयों में अंतिम पंक्ति में तुलसीदास या रामानंद का नाम)।
यह पृष्ठ कौन-सा पाठ मानता है?
हिंदी पाठ: पढ़ने के लिए तैयार पाठ, जो आज के संस्करणों से मिलाया गया है। पुराना प्रमाण: 1900 का कानपुर मुद्रण। अर्थ: पूजादीप के लिए लिखे और जाँचे गए। स्रोत देखें
स्रोत और लाइसेंस
- साक्षी संस्करण (पाठ के समय का प्रमाण)
- 1 Mein 100 Pustak (१ में १०० पुस्तक, "a hundred books in one"), a collection of short devotional books compiled by Pt. Harishankar Shastri; first printing (Pt. Harishankar Shastri (son of Pt. Kundanlal, of Najibabad; head of a Sanskrit college at Hardwar), Pt. Harishankar Shastri, Hardwar (printed at his own cost), Cawnpore (Kanpur), 1900). सार्वजनिक डोमेन (कॉपीराइट-मुक्त)। केवल यह दिखाने के लिए कि पाठ कितना पुराना है। इस पृष्ठ का देवनागरी पाठ एक पठन-पाठ है, इस मुद्रण से नहीं लिया गया।
- प्रचलित पाठ
- इस पाठ में 14 शब्द आज के प्रचलित रूप में हैं; इन्हें गीता प्रेस, गोरखपुर; sanskritdocuments.org; खेमराज श्रीकृष्णदास, बम्बई और रणधीर प्रकाशन, हरिद्वार के पाठ से मिलाकर जाँचा गया।
- हमारी व्याख्या
- इस साइट के लिए यहाँ दिए स्रोतों के आधार पर लिखी और उद्धृत संस्करण से मिलाई गई व्याख्या। यह अनुवाद नहीं है, और पाठ को पढ़ने का एकमात्र तरीका भी नहीं है। श्रेय देकर आप इसे उद्धृत कर सकते हैं।
- जाँच
- उद्धृत संस्करण से मिलाया गया, 15 अक्टूबर 2026।
- अद्यतन
- 27 अक्टूबर 2026