भगवद्गीता 10.20: अर्थ और अनुवाद
अध्याय 10: विभूतियोग। कृष्ण कहते हैं
श्रीमद्भगवद्गीता (Bhagavad Gita) 10.20: कृष्ण कहते हैं कि हे गुडाकेश, वे सब प्राणियों के हृदय में स्थित आत्मा हैं, और प्राणियों के आदि, मध्य और अंत भी वही हैं।
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श्रीमद्भगवद्गीता 10.20
अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः ।अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च ॥
Ahamatma gudakesha sarvabhutashayasthitahAhamadishcha madhyam cha bhutanamanta eva cha
ahamātmā guḍākeśa sarvabhūtāśayasthitaḥ |ahamādiśca madhyaṃ ca bhūtānāmanta eva ca ||
भावार्थ कृष्ण कहते हैं कि हे गुडाकेश, वे सब प्राणियों के हृदय में स्थित आत्मा हैं, और प्राणियों के आदि, मध्य और अंत भी वही हैं। अगले श्लोक से वे हर वर्ग की सबसे श्रेष्ठ वस्तु का नाम लेते हैं। “सब प्राणियों में आत्मा” को परंपराएँ अलग-अलग ढंग से समझती हैं।
English meaning Krishna says he is the self (ātman) seated in the hearts of all beings, Gudakesha, and he is the beginning, the middle and the end of beings. From the next verse he names the foremost in each class of things. The schools read 'the self in all beings' in different ways (see the views).
शब्दार्थ
हर शब्द, शब्दकोश के पृष्ठ के साथ
शब्दार्थ
- अहम् aham · "मैं" (कृष्ण) (सर्वनाम, प्रथमा एकवचन) शब्दकोश: aham, मोनियर-विलियम्स 1899, पृ. 124, स्तंभ 2
nom. sg. ‘I,’
- आत्मा ātmā · आत्मा (संज्ञा (पुंलिंग), प्रथमा एकवचन) शब्दकोश: ātman, मोनियर-विलियम्स 1899, पृ. 135, स्तंभ 1
the individual soul, self
- गुडाकेश guḍākeśa · हे गुडाकेश (अर्जुन) (संज्ञा (पुंलिंग), संबोधन एकवचन) शब्दकोश: guḍā-keśa, मोनियर-विलियम्स 1899, पृ. 356, स्तंभ 3
the hero Arjuna
- सर्वभूताशयस्थितः sarvabhūtāśayasthitaḥ · सब प्राणियों के हृदय में स्थित (समास (पुंलिंग), प्रथमा एकवचन) शब्दकोश: sarva-bhūta, मोनियर-विलियम्स 1899, पृ. 1186, स्तंभ 2
all beings
; ā-śaya, मोनियर-विलियम्स 1899, पृ. 157, स्तंभ 3the seat of feelings and thoughts, the mind, heart, soul
; sthita, मोनियर-विलियम्स 1899, पृ. 1264, स्तंभ 1standing, staying, situated, resting or abiding or remaining in
- अहम् aham · "मैं" (कृष्ण) (सर्वनाम, प्रथमा एकवचन) शब्दकोश: aham, मोनियर-विलियम्स 1899, पृ. 124, स्तंभ 2
nom. sg. ‘I,’
- आदिः ādiḥ · आदि, आरंभ (संज्ञा (पुंलिंग), प्रथमा एकवचन) शब्दकोश: 1. ādi, मोनियर-विलियम्स 1899, पृ. 136, स्तंभ 3
beginning, commencement
- च ca · और (अव्यय) शब्दकोश: 2. ca, मोनियर-विलियम्स 1899, पृ. 380, स्तंभ 1
and, both, also, moreover, as well as
- मध्यम् madhyam · मध्य (संज्ञा (नपुंसकलिंग), प्रथमा एकवचन) शब्दकोश: madhya, मोनियर-विलियम्स 1899, पृ. 781, स्तंभ 3
the middle, midst, centre, inside, interior
- च ca · और (अव्यय) शब्दकोश: 2. ca, मोनियर-विलियम्स 1899, पृ. 380, स्तंभ 1
and, both, also, moreover, as well as
- भूतानाम् bhūtānām · प्राणियों का (संज्ञा (नपुंसकलिंग), षष्ठी बहुवचन) शब्दकोश: bhūta, मोनियर-विलियम्स 1899, पृ. 761, स्तंभ 3
that which is or exists, any living being (divine, human, animal, and even vegetable)
- अन्तः antaḥ · अंत (संज्ञा (पुंलिंग), प्रथमा एकवचन) शब्दकोश: anta, मोनियर-विलियम्स 1899, पृ. 42, स्तंभ 3
end, limit, boundary, term
- एव eva · भी (अव्यय) शब्दकोश: 1. eva, मोनियर-विलियम्स 1899, पृ. 232, स्तंभ 2
just, exactly, very, same, only, even, alone, merely
- च ca · और (अव्यय) शब्दकोश: 2. ca, मोनियर-विलियम्स 1899, पृ. 380, स्तंभ 1
and, both, also, moreover, as well as
पुराने अंग्रेज़ी अनुवाद
Kashinath Trimbak Telang, 1882। सार्वजनिक डोमेन (कॉपीराइट-मुक्त)। पृष्ठ 88।
I am the self, O Gudâkesa! seated in the hearts of all beings1. I am the beginning and the middle and the end also of all beings.
पाद-टिप्पणियाँ (अनुवादक की अपनी) - P. 129 infra. ↩
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Kashinath Trimbak Telang, 1882। सार्वजनिक डोमेन (कॉपीराइट-मुक्त)। पृष्ठ 88।
I am the self, O Gudâkesa! seated in the hearts of all beings1. I am the beginning and the middle and the end also of all beings.
पाद-टिप्पणियाँ (अनुवादक की अपनी) - P. 129 infra. ↩
आप यही पढ़ रहे हैं
Annie Besant, 1895। सार्वजनिक डोमेन (कॉपीराइट-मुक्त)। पृष्ठ 98–99।
I, O Gudâkesha, am the SELF, seated in the heart of all beings; I am the beginning, the middle, and also the end of all beings.
आप यही पढ़ रहे हैं
Swami Swarupananda, 1909 (पहली बार 1907 में छपा)। सार्वजनिक डोमेन (कॉपीराइट-मुक्त)। पृष्ठ 202।
I am the Self, O Gudàkesha, existent in the heart of all beings; I am the beginning, the middle, and also the end of all beings.
आप यही पढ़ रहे हैं
इस श्लोक का हवाला दें
अनुवाद: K. T. Telang, The Bhagavadgîtâ (The Sacred Books of the East, vol. VIII, Oxford: Clarendon Press, 1882), पृष्ठ 88। भगवद्गीता 10.20।
अनुवाद: Annie Besant, The Bhagavad Gîtâ, or The Lord's Song (London: Theosophical Publishing Society, 1895), पृष्ठ 98–99। भगवद्गीता 10.20।
अनुवाद: Swami Swarupananda, Srimad-Bhagavad-Gita (Mayavati: Prabuddha Bharata Press, 1909; first printed in Prabuddha Bharata, 1907–1909), पृष्ठ 202। भगवद्गीता 10.20।
हमारी व्याख्या: “भगवद्गीता 10.20: अर्थ और अनुवाद”। पूजादीप। अद्यतन 25 अक्टूबर 2026। https://pujadeep.com/hi/bhagavad-gita/10/20/
पूजादीप की व्याख्याएँ श्रेय देकर उद्धृत की जा सकती हैं: पूजादीप का नाम और पृष्ठ का लिंक दें। श्रेय कैसे दें
शास्त्रीय व्याख्याएँ, संप्रदाय के अनुसार
हर व्याख्या अपने संप्रदाय के नाम से दी गई है। कोई भी एकमात्र अर्थ के रूप में प्रस्तुत नहीं है।
अद्वैत, विशिष्टाद्वैत और द्वैत क्या सिखाते हैं, संक्षेप में
शंकराचार्य अद्वैत
शंकराचार्य कहते हैं कि भगवान का चिंतन सब प्राणियों के हृदय में अंतरतम आत्मा के रूप में करना चाहिए। जो ऐसा न कर सके, वह आगे बताई गई वस्तुओं में उनका चिंतन करे, क्योंकि वे सब प्राणियों के स्रोत, आधार और अंत हैं।
स्रोत: The Bhagavad-Gita, with the commentary of Sri Sankaracharya, translated by A. Mahadeva Sastri (2nd ed., Mysore: G. T. A. Printing Works, 1901), commentary on 10.20, pp. 241–242. हमारे अपने शब्दों में सार; इसका कोई पाठ उद्धृत नहीं किया गया।
रामानुजाचार्य विशिष्टाद्वैत
रामानुजाचार्य कहते हैं कि सब प्राणी भगवान का शरीर हैं और वे उनमें उनकी आत्मा के रूप में रहते हैं, यानी उनके आधार, नियंता और स्वामी के रूप में। इसी कारण सूची के सब नाम उन्हीं की ओर संकेत कर सकते हैं, जैसे शरीर का नाम उसके भीतर की आत्मा की ओर संकेत करता है।
स्रोत: Sri Bhagavad-Gita with Sri Ramanujacharya's Visishtadvaita commentary, translated by A. Govindacharya (Madras, 1898), commentary on 10.20, pp. 333–334. हमारे अपने शब्दों में सार; इसका कोई पाठ उद्धृत नहीं किया गया।
संस्कृत पाठ: 1922 का मद्रास मुद्रण। अर्थ: पूजादीप के लिए लिखे और जाँचे गए। स्रोत और बदलाव
परिवारों के प्रश्न
गीता 10.20 कौन कहता है?
यह श्लोक कृष्ण कहते हैं, अध्याय 10 (विभूतियोग) में।
संस्कृत पाठ कहाँ से लिया गया है?
संस्कृत पाठ: 1922 का मद्रास मुद्रण। अर्थ: पूजादीप के लिए लिखे और जाँचे गए। स्रोत देखें
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स्रोत और लाइसेंस
- संस्कृत पाठ
- The Bhagavad-Gita, or The Lord's Song, with the text in Devanagari and an English translation (Annie Besant, G. A. Natesan & Co., Madras, 1922). सार्वजनिक डोमेन (कॉपीराइट-मुक्त)। इन पृष्ठों का संस्कृत पाठ इसी मुद्रण के पृष्ठ-चित्रों से पढ़ा गया है।
- अनुवाद
- The Bhagavadgîtâ with the Sanatsugâtîya and the Anugîtâ, translated by Kâshinâth Trimbak Telang (The Sacred Books of the East, vol. VIII, ed. F. Max Müller) (Kashinath Trimbak Telang, F. Max Müller, Clarendon Press, Oxford, 1882). सार्वजनिक डोमेन (कॉपीराइट-मुक्त)। जैसा छपा है, वैसा ही दिखाया गया।
- अनुवाद
- The Bhagavad Gîtâ, or The Lord's Song, translated by Annie Besant (Annie Besant, Theosophical Publishing Society, London, 1895). सार्वजनिक डोमेन (कॉपीराइट-मुक्त)। जैसा छपा है, वैसा ही दिखाया गया।
- अनुवाद
- Srimad-Bhagavad-Gita, with Sanskrit Text; Paraphrase with Word-by-word Literal Translation; English Rendering and Comments, Index, &c., by the Swami Swarupananda (Himalayan Series, No. XX) (Swami Swarupananda, The Editors and Publishers, Advaita Ashrama, Mayavati, Prabuddha Bharata Press, Mayavati, Almora, Himalayas, 1909). सार्वजनिक डोमेन (कॉपीराइट-मुक्त)। जैसा छपा है, वैसा ही दिखाया गया।
- भाष्य
- The Bhagavad-Gita, with the commentary of Sri Sankaracharya, translated by A. Mahadeva Sastri (2nd ed., Mysore: G. T. A. Printing Works, 1901) (Public-domain scan, University of California Libraries). हमारे अपने शब्दों में सार; इसका कोई पाठ उद्धृत नहीं किया गया।
- भाष्य
- Sri Bhagavad-Gita with Sri Ramanujacharya's Visishtadvaita commentary, translated by A. Govindacharya (Madras, 1898) (Scan uploaded to archive.org (folkscanomy collection)). हमारे अपने शब्दों में सार; इसका कोई पाठ उद्धृत नहीं किया गया।
- प्रचलित पाठ
- इस पाठ में 32 शब्द आज के प्रचलित रूप में हैं; इन्हें sanskritdocuments.org; संस्कृत विकिस्रोत; गीता प्रेस, गोरखपुर; ग्रेटिल, गॉटिंगेन और भक्तिवेदांत बुक ट्रस्ट के पाठ से मिलाकर जाँचा गया।
- हमारी व्याख्या
- इस साइट के लिए यहाँ दिए स्रोतों के आधार पर लिखी और उद्धृत संस्करण से मिलाई गई व्याख्या। यह अनुवाद नहीं है, और पाठ को पढ़ने का एकमात्र तरीका भी नहीं है। श्रेय देकर आप इसे उद्धृत कर सकते हैं।
- जाँच
- उद्धृत संस्करण से मिलाया गया, 15 अक्टूबर 2026।
- अद्यतन
- 25 अक्टूबर 2026