गीता उपदेश (Geeta Updesh): श्रीमद्भगवद्गीता के वे श्लोक जिन्हें बहुत से लोग उद्धृत करते हैं, विषय के अनुसार। हर श्लोक का अपना पृष्ठ है, जहाँ उसके सभी 3 पुराने अनुवाद और, जहाँ हैं, संप्रदायों की व्याख्याएँ हैं।
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कर्म, उसका फल और स्वधर्म
कर्म करने और उसके फल को कर्म का कारण न बनाने, कर्मयोग के मार्ग, श्रेष्ठ व्यक्ति के उदाहरण और अपने धर्म (स्वधर्म) पर कृष्ण के वचन।
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन । मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥
हमारी व्याख्या: कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि अर्जुन का अधिकार केवल कर्म करने में है, उसके फल में कभी नहीं। अर्जुन फल को कर्म का कारण न बनाएँ, और कर्म न करने में भी आसक्ति न रखें।
पुराना अंग्रेज़ी अनुवाद (Kashinath Trimbak Telang, 1882)
Your business is with action alone; not by any means with fruit. Let not the fruit of action be your motive (to action). Let not your attachment be (fixed) on inaction1.
हमारी व्याख्या: कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि वे योग में स्थित होकर, आसक्ति छोड़कर, सफलता और असफलता में समान रहकर कर्म करें। यह समता ही योग कहलाती है।
पुराना अंग्रेज़ी अनुवाद (Kashinath Trimbak Telang, 1882)
Having recourse to devotion, O Dhanañgaya! perform actions, casting off (all) attachment, and being equable in success or ill-success; (such) equability is called devotion.
इससे पहले (3.1–3.2) अर्जुन पूछते हैं: यदि बुद्धि कर्म से श्रेष्ठ है, तो कृष्ण उन्हें इस घोर कर्म, यानी युद्ध, में क्यों लगा रहे हैं? वे कृष्ण से वह एक मार्ग बताने को कहते हैं जिससे उन्हें श्रेय (परम कल्याण) मिले।
हमारी व्याख्या: कृष्ण उत्तर देते हैं। वे कहते हैं कि उन्होंने पहले (पुरा) इस संसार में दो प्रकार की निष्ठा बताई थी: सांख्यों के लिए ज्ञानयोग, और योगियों के लिए कर्मयोग। वे अर्जुन को अनघ (निष्पाप) कहकर पुकारते हैं।
पुराना अंग्रेज़ी अनुवाद (Kashinath Trimbak Telang, 1882)
The Deity said:
O sinless one! I have already declared, that in this world there is a twofold path1—that of the Sâṅkhyas by devotion in the shape of (true) knowledge; and that of the Yogins by devotion in the shape of action.
हमारी व्याख्या: कृष्ण कहते हैं कि अपना धर्म (स्वधर्म), कमियों के साथ (विगुण) किया जाए तब भी, अच्छी तरह किए गए दूसरे के धर्म से श्रेष्ठ है। अपने धर्म में रहते हुए मृत्यु भी श्रेष्ठ है; दूसरे का धर्म भय (खतरा) लाने वाला है।
पुराना अंग्रेज़ी अनुवाद (Kashinath Trimbak Telang, 1882)
One's own duty, though defective, is better than another's duty well performed. Death in (performing) one's own duty is preferable; the (performance of the) duty of others is dangerous.
शोक, मृत्यु और आत्मा
शोक में डूबे अर्जुन से कृष्ण के वचन: जन्म और मृत्यु पर, उस आत्मा पर जो न जन्म लेती है न मरती है, और सुख-दुःख पर, जो आते-जाते रहते हैं।
हमारी व्याख्या: यहाँ से कृष्ण का उपदेश आरंभ होता है। वे अर्जुन से कहते हैं कि वे उनके लिए शोक कर रहे हैं जिनके लिए शोक नहीं करना चाहिए, और बातें ज्ञानियों जैसी कर रहे हैं। वे कहते हैं कि ज्ञानी लोग न मरे हुओं के लिए शोक करते हैं, न जीवितों के लिए।
पुराना अंग्रेज़ी अनुवाद (Kashinath Trimbak Telang, 1882)
The Deity said:
You have grieved for those who deserve no grief, and you talk words of wisdom1. Learned men grieve not for the living nor the dead.
पाद-टिप्पणियाँ (अनुवादक की अपनी)
Scil. regarding family-rites, &c., for, says Nîlakantha, they indicate knowledge of soul as distinct from body. ↩
देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा । तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ॥
हमारी व्याख्या: कृष्ण समझाते हैं कि जैसे देह में रहने वाली आत्मा इसी शरीर में बचपन, जवानी और बुढ़ापा पाती है, वैसे ही वह दूसरा शरीर भी पाती है। धीर व्यक्ति इससे मोह में नहीं पड़ता।
पुराना अंग्रेज़ी अनुवाद (Kashinath Trimbak Telang, 1882)
As in this body, infancy and youth and old age (come) to the embodied (self)1, so does the acquisition of another body; a sensible man is not deceived about that.
पाद-टिप्पणियाँ (अनुवादक की अपनी)
A common word in the Gîtâ, that which presides over each individual body. ↩
मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः । आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ॥
हमारी व्याख्या: कृष्ण कहते हैं कि इंद्रियों का विषयों से संपर्क ही सर्दी-गर्मी और सुख-दुःख देता है। ये आते-जाते रहते हैं, टिकते नहीं। वे अर्जुन से इन्हें धैर्य से सहने को कहते हैं।
पुराना अंग्रेज़ी अनुवाद (Kashinath Trimbak Telang, 1882)
The contacts of the senses1, O son of Kuntî! which produce cold and heat, pleasure and pain, are not permanent, they are ever coming and going. Bear them, O descendant of Bharata!
न जायते म्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः । अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥
हमारी व्याख्या: कृष्ण कहते हैं कि आत्मा न कभी जन्म लेती है, न मरती है। ऐसा नहीं कि वह एक बार होकर फिर न रहे। वह अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है। शरीर के मारे जाने पर भी वह नहीं मारी जाती।
पुराना अंग्रेज़ी अनुवाद (Kashinath Trimbak Telang, 1882)
It is not born, nor does it ever die, nor, having existed, does it exist no more. Unborn, everlasting, unchangeable, and primeval, it is not killed when the body is killed1.
हमारी व्याख्या: कृष्ण उदाहरण देते हैं: जैसे मनुष्य पुराने कपड़े छोड़कर नए कपड़े पहन लेता है, वैसे ही देह में रहने वाली आत्मा पुराने शरीर छोड़कर नए शरीरों में चली जाती है।
पुराना अंग्रेज़ी अनुवाद (Kashinath Trimbak Telang, 1882)
As a man, casting off old clothes, puts on others and new ones, so the embodied (self) casting off old bodies, goes to others and new ones.
जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च । तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ॥
हमारी व्याख्या: कृष्ण कहते हैं कि जो जन्मा है उसकी मृत्यु निश्चित है, और जो मरा है उसका जन्म निश्चित है। इसलिए, वे कहते हैं, जिस बात को टाला नहीं जा सकता, उस पर अर्जुन को शोक नहीं करना चाहिए।
पुराना अंग्रेज़ी अनुवाद (Kashinath Trimbak Telang, 1882)
For to one that is born, death is certain; and to one that dies, birth is certain1. Therefore about (this) unavoidable thing, you ought not to grieve.
पाद-टिप्पणियाँ (अनुवादक की अपनी)
Cf. the following from the Sutta Nipâta (Sir M. C. Swamy's translation), pp. 124, 125: 'There is, indeed, no means by which those born could be prevented from dying.' 'Even thus the world is afflicted with death and decay; therefore wise men, knowing the course of things in the world, do not give way to grief.' ↩
कामना, क्रोध और चंचल मन
आसक्ति से कामना और क्रोध के पैदा होने, क्रोध के परिणाम, अपने प्रयास से अपना उद्धार करने, और अभ्यास और वैराग्य से चंचल मन को वश में करने पर कृष्ण के वचन।
हमारी व्याख्या: कृष्ण बताते हैं कि मनुष्य का पतन कैसे होता है। विषयों का चिंतन करने से उनमें आसक्ति पैदा होती है। आसक्ति से कामना जन्म लेती है, और कामना से क्रोध पैदा होता है।
पुराना अंग्रेज़ी अनुवाद (Kashinath Trimbak Telang, 1882)
The man who ponders over objects of sense forms an attachment to them; from (that) attachment is produced desire; and from desire anger is produced1;
हमारी व्याख्या: कृष्ण आगे कहते हैं कि क्रोध से मोह (भ्रम) होता है, मोह से स्मृति भ्रमित हो जाती है, स्मृति के भ्रष्ट होने से बुद्धि का नाश होता है, और बुद्धि के नाश से मनुष्य नष्ट हो जाता है।
पुराना अंग्रेज़ी अनुवाद (Kashinath Trimbak Telang, 1882)
from anger results want of discrimination1; from want of discrimination, confusion of the memory; from confusion of the memory, loss of reason; and in consequence of loss of reason he is utterly ruined.
हमारी व्याख्या: कृष्ण कहते हैं कि मनुष्य स्वयं अपना उद्धार करे, स्वयं को नीचे न गिरने दे; क्योंकि आत्मा ही आत्मा का मित्र है और आत्मा ही आत्मा का शत्रु। संस्कृत दोनों ओर एक ही शब्द “आत्मा” रखती है, इसलिए इस श्लोक को एक से अधिक ढंग से पढ़ा जाता है।
पुराना अंग्रेज़ी अनुवाद (Kashinath Trimbak Telang, 1882)
(A man) should elevate his self by his self1; he should not debase his self, for even (a man's) own self is his friend, (a man's) own self is also his enemy2.
पाद-टिप्पणियाँ (अनुवादक की अपनी)
I. e. by means of a mind possessed of true discrimination. ↩
Self is here explained as mind, the unsteadiness of which prevents the acquisition of devotion, p. 71. ↩
हमारी व्याख्या: कृष्ण उत्तर देते हैं कि निःसंदेह मन चंचल है और उसे वश में करना कठिन है, पर अभ्यास और वैराग्य से उसे वश में किया जा सकता है। वे अर्जुन को महाबाहो और कौन्तेय कहकर पुकारते हैं।
पुराना अंग्रेज़ी अनुवाद (Kashinath Trimbak Telang, 1882)
The Deity said:
Doubtless, O you of mighty arms! the mind is difficult to restrain, and fickle1. Still, O son of Kuntî! it may be restrained by constant practice and by indifference (to worldly objects).
कृष्ण संसार में क्यों आते हैं, अपनी उपासना करने वालों के लिए वे क्या करते हैं, कौन-सी सरल भेंट वे स्वीकार करते हैं, कौन-सा भक्त उन्हें प्रिय है, और उनकी शरण में आने का उनका वचन। 12.1 में अर्जुन उपासना के बारे में एक प्रश्न पूछते हैं।
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत । अभ्युत्थानमधर्मस्य तदाऽऽत्मानं सृजाम्यहम् ॥
हमारी व्याख्या: कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म बढ़ता है, तब-तब वे स्वयं को प्रकट करते हैं। यह गीता के सबसे प्रसिद्ध श्लोकों में से एक है।
पुराना अंग्रेज़ी अनुवाद (Kashinath Trimbak Telang, 1882)
Whensoever, O descendant of Bharata! piety languishes, and impiety is in the ascendant, I create myself.
हमारी व्याख्या: कृष्ण बताते हैं कि वे क्यों आते हैं: सज्जनों की रक्षा के लिए, बुरे काम करने वालों के विनाश के लिए, और धर्म को दृढ़ता से स्थापित करने के लिए। इसके लिए वे युग-युग में जन्म लेते हैं। श्लोक 7 और 8 मिलकर गीता के अपने शब्दों में बताते हैं कि भगवान अवतार क्यों लेते हैं।
पुराना अंग्रेज़ी अनुवाद (Kashinath Trimbak Telang, 1882)
I am born age after age, for the protection of the good, for the destruction of evil-doers, and the establishment of piety.
हमारी व्याख्या: कृष्ण कहते हैं कि जो लोग अनन्य भाव से, केवल उन्हीं का चिंतन करते हुए, उनकी उपासना करते हैं और सदा उनसे जुड़े रहते हैं, उनका योगक्षेम वे स्वयं वहन करते हैं: जो उनके पास नहीं, उसे दिलाना, और जो है, उसकी रक्षा करना।
पुराना अंग्रेज़ी अनुवाद (Kashinath Trimbak Telang, 1882)
To those men who worship me, meditating on me and on no one else, and who are constantly devoted, I give new gifts and preserve what is acquired by them1.
पाद-टिप्पणियाँ (अनुवादक की अपनी)
Cf. Dhammapada, stanza 23. I. e. attainment to the Brahman and not returning from it.—Râmânuga. ↩
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति । तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ॥
हमारी व्याख्या: कृष्ण कहते हैं कि जो कोई भक्ति से उन्हें पत्ता, फूल, फल या जल अर्पित करता है, शुद्ध मन वाले उस व्यक्ति का प्रेम से दिया वह उपहार वे स्वीकार करते हैं।
पुराना अंग्रेज़ी अनुवाद (Kashinath Trimbak Telang, 1882)
Whoever with devotion offers me leaf, flower, fruit, water, that, presented with devotion, I accept from him whose self is pure.
एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते । ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः ॥
हमारी व्याख्या: अर्जुन एक प्रश्न पूछते हैं। कुछ भक्त इसी प्रकार, जैसा अध्याय 11 के अंत में बताया गया, सदा कृष्ण से जुड़े रहकर उनकी उपासना करते हैं। दूसरे लोग अक्षर (अविनाशी) और अव्यक्त (जो इंद्रियों से न दिखे) की उपासना करते हैं। इन दोनों में योग को अधिक अच्छी तरह कौन जानता है?
पुराना अंग्रेज़ी अनुवाद (Kashinath Trimbak Telang, 1882)
Arguna said:
Of the worshippers, who thus, constantly devoted, meditate on you, and those who (meditate) on the unperceived and indestructible, which best know devotion?
हमारी व्याख्या: यहाँ से अध्याय के अंत तक कृष्ण उस भक्त का वर्णन करते हैं जो उन्हें प्रिय है। ऐसा व्यक्ति किसी प्राणी से द्वेष नहीं करता, सबसे मित्रता और करुणा रखता है, ममता (“यह मेरा है” का भाव) और अहंकार से मुक्त है, सुख-दुःख में समान रहता है और क्षमाशील है।
पुराना अंग्रेज़ी अनुवाद (Kashinath Trimbak Telang, 1882)
That devotee of mine, who hates no being, who is friendly and compassionate, who is free from egoism, and from (the idea that this or that is) mine, to whom happiness and misery are alike, who is forgiving, contented, constantly devoted, self-restrained, and firm in his determinations, and whose mind and understanding are devoted to me, he is dear to me.
हमारी व्याख्या: कृष्ण कहते हैं कि अर्जुन सब धर्मों को छोड़कर केवल उनकी शरण में आएँ; वे अर्जुन को सब पापों से मुक्त करेंगे; शोक न करें। यह श्लोक छोटा है और इस पर बहुत विचार हुआ है।
पुराना अंग्रेज़ी अनुवाद (Kashinath Trimbak Telang, 1882)
Forsaking all duties1, come to me as (your) sole refuge. I will release you from all sins. Be not grieved.
पाद-टिप्पणियाँ (अनुवादक की अपनी)
Of caste or order, such as Agnihotra and so forth. ↩
इस पाठ में 32 शब्द आज के प्रचलित रूप में हैं; इन्हें sanskritdocuments.org; संस्कृत विकिस्रोत; गीता प्रेस, गोरखपुर; ग्रेटिल, गॉटिंगेन और भक्तिवेदांत बुक ट्रस्ट के पाठ से मिलाकर जाँचा गया।
हमारी व्याख्या
इस साइट के लिए यहाँ दिए स्रोतों के आधार पर लिखी और उद्धृत संस्करण से मिलाई गई व्याख्या। यह अनुवाद नहीं है, और पाठ को पढ़ने का एकमात्र तरीका भी नहीं है। श्रेय देकर आप इसे उद्धृत कर सकते हैं।