अन्नप्राशन संस्कार क्या है?
अन्नप्राशन, यानी "अन्न खिलाना", वह संस्कार है जिसमें शिशु पहली बार ठोस भोजन खाता है। गृह्यसूत्र और मनुस्मृति इसे जन्म के छठे महीने में रखते हैं; कुछ परिवार इसे थोड़ा बाद में करते हैं। भोजन आम तौर पर चावल होता है: पुरानी विधि-पुस्तकों में दही, शहद और घी मिला भात, और बाद के पारिवारिक विवरणों में खीर, या चीनी, शहद और घी के साथ चावल। पुरानी विधि-पुस्तकें दूसरे भोजन भी गिनाती हैं, जिनमें मांस और मछली भी हैं, और अलग-अलग परिवार अलग नियम मानते हैं। पहला कौर माता-पिता या कोई बड़ा देता है, अक्सर प्रार्थना और पवित्र अग्नि में आहुति के बाद।
रीतियाँ क्षेत्र, वेद-शाखा और परिवार के अनुसार अलग होती हैं। कुल-पुरोहित का मार्गदर्शन और परिवार की अपनी रीति पहले आती है।
पूजादीप के लिए लिखा गया, और नीचे दिए गए स्रोतों से मिलाया गया।
हर परंपरा क्या कहती है
ऋग्वेद के गृह्यसूत्र (आश्वलायन और शांखायन)
दोनों विधि-पुस्तकें यह संस्कार छठे महीने में रखती हैं। वे कई भोजन गिनाती हैं, हर एक बच्चे के लिए किसी कामना से जुड़ा: घी के साथ भात, बकरे का मांस या तीतर (और शांखायन में मछली भी)। भोजन में दही, शहद और घी मिलाकर "अन्नपते" मंत्र के साथ दिया जाता है, जो अन्न के स्वामी से निरोग और बलदायक अन्न माँगता है। शांखायन में बच्चे को पहले कुश पर बिठाया जाता है, और जो बचता है उसे माता खाती है। बेटी के लिए आश्वलायन यह संस्कार मंत्र के बिना रखते हैं।
इस पाठ के स्रोत
- शांखायन गृह्यसूत्र 1.27, ओल्डनबर्ग का अंग्रेज़ी अनुवाद (गृह्यसूत्र, भाग 1, 1886), पृष्ठ 54–55: छठे महीने में अन्नप्राशन, भोजन और शुभकामनाएँ, कुश पर बच्चा, और बचा भोजन माँ खाए
- आश्वलायन गृह्यसूत्र 1.16, ओल्डनबर्ग का अंग्रेज़ी अनुवाद (1886), पृष्ठ 183–184: छठा महीना, दही, शहद और घी मिला भोजन, 'अन्नपते' मंत्र, और कन्या के लिए मंत्र के बिना केवल विधि
यजुर्वेद के गृह्यसूत्र (पारस्कर और आपस्तंब)
पारस्कर की विधि-पुस्तक (शुक्ल यजुर्वेद) में पिता आहुतियाँ देते हैं, जिनमें एक वाणी की देवी वाक् को है। फिर स्वयं भोजन करके वे हर प्रकार और हर स्वाद का थोड़ा-थोड़ा अन्न अलग रखते हैं और बच्चे को खिलाते हैं, चुपचाप या "हन्त" शब्द कहकर। पारस्कर कुछ कामनाओं के लिए मांस और मछली भी गिनाते हैं, और संस्कार ब्राह्मण-भोजन से पूरा होता है। आपस्तंब की विधि-पुस्तक (कृष्ण यजुर्वेद) में ब्राह्मणों को भोजन कराकर उनसे आशीर्वाद लिया जाता है, फिर बच्चे को दही, शहद और घी मिला भात दिया जाता है; कुछ आचार्य तीतर भी जोड़ते हैं।
इस पाठ के स्रोत
- पारस्कर गृह्यसूत्र 1.19, ओल्डनबर्ग का अंग्रेज़ी अनुवाद (1886), पृष्ठ 299–300: वाणी को आहुति, पिता का सब तरह के स्वाद वाला भोजन अलग रखकर बच्चे को खिलाना, और ब्राह्मण-भोजन
- आपस्तंब गृह्यसूत्र 6.16.1–2, ओल्डनबर्ग का अंग्रेज़ी अनुवाद (गृह्यसूत्र, भाग 2, 1892), पृष्ठ 283: छठे महीने ब्राह्मण-भोजन और आशीर्वाद, फिर दही, शहद, घी और भात मिलाकर बच्चे को खिलाना
धर्मशास्त्र (मनु)
मनुस्मृति शिशु के पहली बार घर से बाहर निकलने (निष्क्रमण) को चौथे महीने में और पहली बार अन्न खिलाने को छठे महीने में रखती है। वह यह भी कहती है कि परिवार की रीति जो दूसरा शुभ संस्कार माँगे, वह भी किया जा सकता है। उसके पुराने टीकाकार परिवार की रीति वाली इस बात को सभी संस्कारों पर लागू मानते हैं।
इस पाठ के स्रोत
गुजरात में परिवारों की रीति
1920 का गुजराती ब्राह्मण परिवारों का एक विवरण यह संस्कार लगभग छठे महीने में, और नागर ब्राह्मणों में लगभग नौवें महीने में बताता है। दूध, चीनी और चावल की खीर बनती है। उसमें से थोड़ी-सी चाँदी के सिक्के पर रखकर शिशु को चटाई जाती है; पुराना नियम सोने का सिक्का कहता है। सिक्का बुआ रखती है।
इस पाठ के स्रोत
केरल में परिवारों की रीति
त्रावणकोर का 1906 का एक विवरण दो रीतियाँ बताता है। नंबूदिरी ब्राह्मणों में यह संस्कार बच्चे के छह महीने का होने पर किसी शुभ दिन होता है। मित्र और संबंधी जुटते हैं, भोजन को मंत्रों से पवित्र किया जाता है, और पिता चाँदी के पात्र से बच्चे को थोड़ा चावल, चीनी, शहद, घी और जल खिलाते हैं। नायर परिवारों में यह संस्कार, जिसे चोरूण कहते हैं, छठे महीने में होता है: मामा या पिता बच्चे को पहली बार चावल खिलाते हैं, और इसके बाद ही बच्चे को चावल दिया जाता है।
इस पाठ के स्रोत
- वी. नागम अय्या, त्रावणकोर स्टेट मैनुअल, खंड 2 (1906), पृष्ठ 256 (नंबूदिरी: अन्नप्राशन) और 352 (नायर: अन्नप्राशन या चोरूण)
मैसूर में परिवारों की रीति (कन्नड़ प्रदेश)
मैसूर राज्य, यानी कन्नड़ प्रदेश, के ब्राह्मण परिवारों का 1928 का एक विवरण यह संस्कार छठे महीने में बताता है, या आठवें में, यदि परिवार की रीति ऐसी हो। गणेश पूजा और अग्नि में आहुतियों के बाद केले के पत्ते पर सब पकवान परोसे जाते हैं। पिता चावल में दही, घी और शहद मिलाते हैं, अन्नपति का मंत्र पढ़ते हैं, और हर मंत्र के अंत में अपनी अँगूठियों से बच्चे को खिलाते हैं। फिर माता उसी पत्ते से बच्चे को खिलाती है, और निकट संबंधी भी ऐसा ही करते हैं। अंत में आरती उतारी जाती है।
इस पाठ के स्रोत
स्रोत
- मनुस्मृति 2.34, बूलर का अंग्रेज़ी अनुवाद (1886), पृष्ठ 36: छठे महीने पहला अन्न, और कुल की रीति से दूसरे संस्कार
- वी. नागम अय्या, त्रावणकोर स्टेट मैनुअल, खंड 2 (1906), पृष्ठ 256: छह महीने पर किसी शुभ दिन पहली बार चावल खिलाना
संस्कार और पारिवारिक विधियाँ
इस संस्कार के मुहूर्त के नियम, और आपके शहर के लिए समय। हर तिथि हमारे पंचांग की गणना से आती है, नियम और स्रोत के साथ। कुल-पुरोहित का निर्णय पहले आता है।
और प्रश्न
स्रोत और लाइसेंस
- हमारी व्याख्या
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- जाँच
- दिए गए स्रोतों से मिलाया गया, 15 अक्टूबर 2026।