भगवद्गीता 16.8: अर्थ और अनुवाद
अध्याय 16: दैवासुरसम्पद्विभागयोग। कृष्ण कहते हैं
श्रीमद्भगवद्गीता (Bhagavad Gita) 16.8: कृष्ण बताते हैं कि ऐसे लोग संसार के बारे में क्या कहते हैं: कि जगत “असत्य है, बिना आधार के है, बिना ईश्वर के है”, कि यह आपसी मेल से बना है, और काम (इच्छा) ही इसका एकमात्र कारण है।
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श्रीमद्भगवद्गीता 16.8
असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् ।अपरस्परसंभूतं किमन्यत्कामहैतुकम् ॥
Asatyamapratishtham te jagadahuranishvaramAparasparasambhutam kimanyatkamahaitukam
asatyamapratiṣṭhaṃ te jagadāhuranīśvaram |aparasparasaṃbhūtaṃ kimanyatkāmahaitukam ||
भावार्थ कृष्ण बताते हैं कि ऐसे लोग संसार के बारे में क्या कहते हैं: कि जगत “असत्य है, बिना आधार के है, बिना ईश्वर के है”, कि यह आपसी मेल से बना है, और काम (इच्छा) ही इसका एकमात्र कारण है। इस श्लोक को परंपराएँ अलग-अलग ढंग से पढ़ती हैं।
English meaning Krishna tells what such people say of the world: that it is "without truth, without a foundation, without a Lord (anīśvara)", that it comes from union, one with another, and that desire alone is its cause. The schools read this verse differently (see the views).
शब्दार्थ
हर शब्द, शब्दकोश के पृष्ठ के साथ
शब्दार्थ
- असत्यम् asatyam · सत्य से रहित, असत्य (विशेषण (नपुंसकलिंग), द्वितीया एकवचन) शब्दकोश: a-satya, मोनियर-विलियम्स 1899, पृ. 118, स्तंभ 2
untrue, false, lying
- अप्रतिष्ठम् apratiṣṭham · बिना आधार का (विशेषण (नपुंसकलिंग), द्वितीया एकवचन) शब्दकोश: a-pratiṣṭha, मोनियर-विलियम्स 1899, पृ. 58, स्तंभ 1
having no solid ground, no value, fluctuating, unsafe
- ते te · वे (सर्वनाम (पुंलिंग), प्रथमा बहुवचन) शब्दकोश: tad, मोनियर-विलियम्स 1899, पृ. 434, स्तंभ 1
m. he, f. she, n. it, that, this
- जगत् jagat · जगत, संसार (संज्ञा (नपुंसकलिंग), द्वितीया एकवचन) शब्दकोश: jagat, मोनियर-विलियम्स 1899, पृ. 408, स्तंभ 1
the world, esp. this world, earth
- आहुः āhuḥ · कहते हैं (लिट् रूप, वर्तमान अर्थ, प्रथम पुरुष बहुवचन) शब्दकोश: 1. ah, मोनियर-विलियम्स 1899, पृ. 124, स्तंभ 1
to say, speak
- अनीश्वरम् anīśvaram · बिना ईश्वर का (विशेषण (नपुंसकलिंग), द्वितीया एकवचन) शब्दकोश: an-īśvara, मोनियर-विलियम्स 1899, पृ. 30, स्तंभ 3
not belonging to the Deity; atheistical
- अपरस्परसंभूतम् aparasparasaṃbhūtam · परस्पर संयोग से उत्पन्न (समास (नपुंसकलिंग), द्वितीया एकवचन) शब्दकोश: 1. a-para, मोनियर-विलियम्स 1899, पृ. 50, स्तंभ 2
not produced one by the other
; sam-bhūta, मोनियर-विलियम्स 1899, पृ. 1179, स्तंभ 2become, born, produced or arisen or proceeding from
- किम् kim · क्या (सर्वनाम (नपुंसकलिंग), प्रथमा एकवचन) शब्दकोश: kim, मोनियर-विलियम्स 1899, पृ. 282, स्तंभ 2
what? how? whence? wherefore? why?
- अन्यत् anyat · और (कुछ) (सर्वनाम (नपुंसकलिंग), प्रथमा एकवचन) शब्दकोश: 2. anya, मोनियर-विलियम्स 1899, पृ. 45, स्तंभ 2
other, different
- कामहैतुकम् kāmahaitukam · काम (वासना) से उत्पन्न (समास (नपुंसकलिंग), द्वितीया एकवचन) शब्दकोश: kāma, मोनियर-विलियम्स 1899, पृ. 271, स्तंभ 3
wish, desire, longing
; haituka, मोनियर-विलियम्स 1899, पृ. 1304, स्तंभ 1caused by, dependent on
1 छपाई में पाठभेद
संस्करणों के अंतर। कोई दूसरा मुद्रण या पाठ इस स्थान को अलग ढंग से पढ़ता है।
- वर्तनी एक डिजिटल प्रति में पाठ है शब्द वही है। यह डिजिटल प्रति वर्ग का पंचमाक्षर लिखती है (सम्भूतं); 1922 का संस्करण अनुस्वार लिखता है (संभूतं)।
पुराने अंग्रेज़ी अनुवाद
Kashinath Trimbak Telang, 1882। सार्वजनिक डोमेन (कॉपीराइट-मुक्त)। पृष्ठ 115।
They say the universe is devoid of truth1, devoid of fixed principle2, and devoid of a ruler, produced by union (of male and female) caused by lust3, and nothing else.
पाद-टिप्पणियाँ (अनुवादक की अपनी) 3 अनुवादों की तुलना करें
Kashinath Trimbak Telang, 1882। सार्वजनिक डोमेन (कॉपीराइट-मुक्त)। पृष्ठ 115।
They say the universe is devoid of truth1, devoid of fixed principle2, and devoid of a ruler, produced by union (of male and female) caused by lust3, and nothing else.
पाद-टिप्पणियाँ (अनुवादक की अपनी) आप यही पढ़ रहे हैं
Annie Besant, 1895। सार्वजनिक डोमेन (कॉपीराइट-मुक्त)। पृष्ठ 141।
"The universe is without truth, without (moral) basis," they say, "without a God1, brought about by mutual union and caused by lust and nothing else."
पाद-टिप्पणियाँ (अनुवादक की अपनी) - Îshvara, the Ruler of a Universe, ↩
आप यही पढ़ रहे हैं
Swami Swarupananda, 1909 (पहली बार 1907 में छपा)। सार्वजनिक डोमेन (कॉपीराइट-मुक्त)। पृष्ठ 298।
They say, "The universe is without truth, without (moral) basis, without a God, brought about by mutual union, with lust for its cause; what else?"
आप यही पढ़ रहे हैं
इस श्लोक का हवाला दें
अनुवाद: K. T. Telang, The Bhagavadgîtâ (The Sacred Books of the East, vol. VIII, Oxford: Clarendon Press, 1882), पृष्ठ 115। भगवद्गीता 16.8।
अनुवाद: Annie Besant, The Bhagavad Gîtâ, or The Lord's Song (London: Theosophical Publishing Society, 1895), पृष्ठ 141। भगवद्गीता 16.8।
अनुवाद: Swami Swarupananda, Srimad-Bhagavad-Gita (Mayavati: Prabuddha Bharata Press, 1909; first printed in Prabuddha Bharata, 1907–1909), पृष्ठ 298। भगवद्गीता 16.8।
हमारी व्याख्या: “भगवद्गीता 16.8: अर्थ और अनुवाद”। पूजादीप। अद्यतन 25 अक्टूबर 2026। https://pujadeep.com/hi/bhagavad-gita/16/8/
पूजादीप की व्याख्याएँ श्रेय देकर उद्धृत की जा सकती हैं: पूजादीप का नाम और पृष्ठ का लिंक दें। श्रेय कैसे दें
शास्त्रीय व्याख्याएँ, संप्रदाय के अनुसार
हर व्याख्या अपने संप्रदाय के नाम से दी गई है। कोई भी एकमात्र अर्थ के रूप में प्रस्तुत नहीं है।
अद्वैत, विशिष्टाद्वैत और द्वैत क्या सिखाते हैं, संक्षेप में
शंकराचार्य अद्वैत
शंकराचार्य इन शब्दों को इन लोगों का अपना दावा बताते हैं: जैसे वे स्वयं असत्य हैं वैसे ही जगत असत्य है; धर्म और अधर्म उसका आधार नहीं हैं; कोई ईश्वर उस पर शासन नहीं करता; और काम के वश स्त्री-पुरुष का मेल ही उसका एकमात्र कारण है, कोई अदृष्ट कारण नहीं, कोई कर्म नहीं। शंकराचार्य के अनुसार यह एक पुराने दार्शनिक मत, लोकायतिकों (भौतिकवादियों), का मत है, कि काम ही सब प्राणियों का एकमात्र कारण है। यह पहचान शंकराचार्य की है: श्लोक किसी मत का नाम नहीं लेता, और रामानुजाचार्य की टीका भी किसी का नाम नहीं लेती।
स्रोत: The Bhagavad-Gita, with the commentary of Sri Sankaracharya, translated by A. Mahadeva Sastri (2nd ed., Mysore: G. T. A. Printing Works, 1901), commentary on 16.8, pp. 376–377. हमारे अपने शब्दों में सार; इसका कोई पाठ उद्धृत नहीं किया गया।
रामानुजाचार्य विशिष्टाद्वैत
रामानुजाचार्य असत्य का अर्थ लेते हैं “सत्य-स्वरूप ब्रह्म का कार्य नहीं”, अप्रतिष्ठ का “ब्रह्म पर टिका नहीं”, और अनीश्वर का “उस ईश्वर द्वारा शासित नहीं जिसका संकल्प कभी विफल नहीं होता”। वे कहते हैं कि इस मत में जगत स्त्री और पुरुष के मेल की उपज से अधिक कुछ नहीं, और काम ही उसका एकमात्र कारण है।
स्रोत: Sri Bhagavad-Gita with Sri Ramanujacharya's Visishtadvaita commentary, translated by A. Govindacharya (Madras, 1898), commentary on 16.8, p. 490. हमारे अपने शब्दों में सार; इसका कोई पाठ उद्धृत नहीं किया गया।
संस्कृत पाठ: 1922 का मद्रास मुद्रण। अर्थ: पूजादीप के लिए लिखे और जाँचे गए। स्रोत और बदलाव
परिवारों के प्रश्न
गीता 16.8 कौन कहता है?
यह श्लोक कृष्ण कहते हैं, अध्याय 16 (दैवासुरसम्पद्विभागयोग) में।
संस्कृत पाठ कहाँ से लिया गया है?
संस्कृत पाठ: 1922 का मद्रास मुद्रण। अर्थ: पूजादीप के लिए लिखे और जाँचे गए। स्रोत देखें
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स्रोत और लाइसेंस
- संस्कृत पाठ
- The Bhagavad-Gita, or The Lord's Song, with the text in Devanagari and an English translation (Annie Besant, G. A. Natesan & Co., Madras, 1922). सार्वजनिक डोमेन (कॉपीराइट-मुक्त)। इन पृष्ठों का संस्कृत पाठ इसी मुद्रण के पृष्ठ-चित्रों से पढ़ा गया है।
- अनुवाद
- The Bhagavadgîtâ with the Sanatsugâtîya and the Anugîtâ, translated by Kâshinâth Trimbak Telang (The Sacred Books of the East, vol. VIII, ed. F. Max Müller) (Kashinath Trimbak Telang, F. Max Müller, Clarendon Press, Oxford, 1882). सार्वजनिक डोमेन (कॉपीराइट-मुक्त)। जैसा छपा है, वैसा ही दिखाया गया।
- अनुवाद
- The Bhagavad Gîtâ, or The Lord's Song, translated by Annie Besant (Annie Besant, Theosophical Publishing Society, London, 1895). सार्वजनिक डोमेन (कॉपीराइट-मुक्त)। जैसा छपा है, वैसा ही दिखाया गया।
- अनुवाद
- Srimad-Bhagavad-Gita, with Sanskrit Text; Paraphrase with Word-by-word Literal Translation; English Rendering and Comments, Index, &c., by the Swami Swarupananda (Himalayan Series, No. XX) (Swami Swarupananda, The Editors and Publishers, Advaita Ashrama, Mayavati, Prabuddha Bharata Press, Mayavati, Almora, Himalayas, 1909). सार्वजनिक डोमेन (कॉपीराइट-मुक्त)। जैसा छपा है, वैसा ही दिखाया गया।
- भाष्य
- The Bhagavad-Gita, with the commentary of Sri Sankaracharya, translated by A. Mahadeva Sastri (2nd ed., Mysore: G. T. A. Printing Works, 1901) (Public-domain scan, University of California Libraries). हमारे अपने शब्दों में सार; इसका कोई पाठ उद्धृत नहीं किया गया।
- भाष्य
- Sri Bhagavad-Gita with Sri Ramanujacharya's Visishtadvaita commentary, translated by A. Govindacharya (Madras, 1898) (Scan uploaded to archive.org (folkscanomy collection)). हमारे अपने शब्दों में सार; इसका कोई पाठ उद्धृत नहीं किया गया।
- प्रचलित पाठ
- इस पाठ में 32 शब्द आज के प्रचलित रूप में हैं; इन्हें sanskritdocuments.org; संस्कृत विकिस्रोत; गीता प्रेस, गोरखपुर; ग्रेटिल, गॉटिंगेन और भक्तिवेदांत बुक ट्रस्ट के पाठ से मिलाकर जाँचा गया।
- हमारी व्याख्या
- इस साइट के लिए यहाँ दिए स्रोतों के आधार पर लिखी और उद्धृत संस्करण से मिलाई गई व्याख्या। यह अनुवाद नहीं है, और पाठ को पढ़ने का एकमात्र तरीका भी नहीं है। श्रेय देकर आप इसे उद्धृत कर सकते हैं।
- जाँच
- उद्धृत संस्करण से मिलाया गया, 14 अक्टूबर 2026।
- अद्यतन
- 25 अक्टूबर 2026