भगवद्गीता 6.21: अर्थ और अनुवाद
अध्याय 6: ध्यानयोग। कृष्ण कहते हैं
श्रीमद्भगवद्गीता (Bhagavad Gita) 6.21: कृष्ण: वाक्य आगे कहता है कि उस अवस्था में व्यक्ति उस असीम सुख को जानता है जिसे बुद्धि ग्रहण कर सकती है पर इंद्रियाँ नहीं, और वहाँ स्थित होकर वह सत्य से नहीं हटता।
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श्रीमद्भगवद्गीता 6.21
सुखमात्यन्तिकं यत्तद् बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम् ।वेत्ति यत्र न चैवाऽयं स्थितश्चलति तत्त्वतः ॥
Sukhamatyantikam yattad buddhigrahyamatindriyamVetti yatra na chaivayam sthitashchalati tattvatah
sukhamātyantikaṃ yattad buddhigrāhyamatīndriyam |vetti yatra na caivā’yaṃ sthitaścalati tattvataḥ ||
भावार्थ वाक्य आगे कहता है कि उस अवस्था में व्यक्ति उस असीम सुख को जानता है जिसे बुद्धि ग्रहण कर सकती है पर इंद्रियाँ नहीं, और वहाँ स्थित होकर वह सत्य से नहीं हटता।
English meaning In that state, the sentence goes on, a person knows a boundless joy that the understanding (buddhi) can grasp but the senses cannot, and, once settled there, does not move away from the truth.
शब्दार्थ
हर शब्द, शब्दकोश के पृष्ठ के साथ
शब्दार्थ
- सुखम् sukham · सुख (संज्ञा (नपुंसकलिंग), द्वितीया एकवचन) शब्दकोश: sukha, मोनियर-विलियम्स 1899, पृ. 1221, स्तंभ 1
ease, easiness, comfort, prosperity, pleasure, happiness
- आत्यन्तिकम् ātyantikam · अनंत, परम (विशेषण (नपुंसकलिंग), द्वितीया एकवचन) शब्दकोश: ātyantika, मोनियर-विलियम्स 1899, पृ. 136, स्तंभ 1
continual, uninterrupted, infinite, endless
- यत् yat · जो (सर्वनाम (नपुंसकलिंग), द्वितीया एकवचन) शब्दकोश: yad, मोनियर-विलियम्स 1899, पृ. 844, स्तंभ 2
who, which, what, whichever, whatever, that
- तत् tat · उस (सर्वनाम (नपुंसकलिंग), द्वितीया एकवचन) शब्दकोश: tad, मोनियर-विलियम्स 1899, पृ. 434, स्तंभ 1
m. he, f. she, n. it, that, this
- बुद्धिग्राह्यम् buddhigrāhyam · बुद्धि से ग्रहण होने वाला (समास (नपुंसकलिंग), द्वितीया एकवचन) शब्दकोश: buddhi, मोनियर-विलियम्स 1899, पृ. 733, स्तंभ 3
intelligence, reason, intellect, mind, discernment, judgment
; grāhya, मोनियर-विलियम्स 1899, पृ. 373, स्तंभ 1to be perceived or recognised or understood
- अतीन्द्रियम् atīndriyam · इंद्रियों से परे (विशेषण (नपुंसकलिंग), द्वितीया एकवचन) शब्दकोश: atīndriya, मोनियर-विलियम्स 1899, पृ. 16, स्तंभ 2
beyond the (cognizance of the) senses
- वेत्ति vetti · जानता है (वर्तमान काल (लट्), प्रथम पुरुष एकवचन) शब्दकोश: 1. vid, मोनियर-विलियम्स 1899, पृ. 963, स्तंभ 2
to know, understand, perceive, learn
- यत्र yatra · जहाँ (अव्यय) शब्दकोश: yatra, मोनियर-विलियम्स 1899, पृ. 841, स्तंभ 2
in or to which place, where, wherein, wherever
- न na · नहीं (अव्यय) शब्दकोश: 2. na, मोनियर-विलियम्स 1899, पृ. 523, स्तंभ 1
ind. not, no, nor, neither
- च ca · और (अव्यय) शब्दकोश: 2. ca, मोनियर-विलियम्स 1899, पृ. 380, स्तंभ 1
ind. and, both, also, moreover, as well as
- एव eva · ही (अव्यय) शब्दकोश: 1. eva, मोनियर-विलियम्स 1899, पृ. 232, स्तंभ 2
just, exactly, very, same, only, even, alone, merely
- अयम् ayam · यह (सर्वनाम (पुंलिंग), प्रथमा एकवचन) शब्दकोश: 1. idam, मोनियर-विलियम्स 1899, पृ. 165, स्तंभ 2
this, this here, referring to something near the speaker
- स्थितः sthitaḥ · स्थित (भूतकालिक कृदन्त (पुंलिंग), प्रथमा एकवचन) शब्दकोश: sthita, मोनियर-विलियम्स 1899, पृ. 1264, स्तंभ 1
standing, staying, situated, resting or abiding or remaining in
- चलति calati · डिगता है (वर्तमान काल (लट्), प्रथम पुरुष एकवचन) शब्दकोश: cal, मोनियर-विलियम्स 1899, पृ. 391, स्तंभ 1
to be moved, stir, tremble, shake, quiver, be agitated
- तत्त्वतः tattvataḥ · तत्त्व से (अव्यय) शब्दकोश: tattva, मोनियर-विलियम्स 1899, पृ. 433, स्तंभ 1
according to the true state or nature of anything, in truth
1 छपाई में पाठभेद
संस्करणों के अंतर। कोई दूसरा मुद्रण या पाठ इस स्थान को अलग ढंग से पढ़ता है।
- वर्तनी एक डिजिटल प्रति में पाठ है शब्द वही हैं। 1922 का संस्करण मिले हुए स्वर को अवग्रह से दिखाता है (चैवाऽयं); यह डिजिटल प्रति ऐसा नहीं करती।
पुराने अंग्रेज़ी अनुवाद
Kashinath Trimbak Telang, 1882। सार्वजनिक डोमेन (कॉपीराइट-मुक्त)।
Telang translates verses 20–23 as one sentence; see 6.20. 6.20 पर पढ़ें
3 अनुवादों की तुलना करें
Kashinath Trimbak Telang, 1882। सार्वजनिक डोमेन (कॉपीराइट-मुक्त)।
Telang translates verses 20–23 as one sentence; see 6.20. 6.20 पर पढ़ें
आप यही पढ़ रहे हैं
Annie Besant, 1895। सार्वजनिक डोमेन (कॉपीराइट-मुक्त)। पृष्ठ 69।
When he knoweth the infinite delight grasped by Buddhi, beyond the senses, and, established therein, moveth not from the Reality;
यह वाक्य 6.20 से शुरू होता है। यह वाक्य 6.22 में आगे चलता है।
आप यही पढ़ रहे हैं
Swami Swarupananda, 1909 (पहली बार 1907 में छपा)। सार्वजनिक डोमेन (कॉपीराइट-मुक्त)।
Swarupananda renders verses 20–23 together; see 6.20. 6.20 पर पढ़ें
आप यही पढ़ रहे हैं
इस श्लोक का हवाला दें
अनुवाद: K. T. Telang, The Bhagavadgîtâ (The Sacred Books of the East, vol. VIII, Oxford: Clarendon Press, 1882), पृष्ठ 69–70। भगवद्गीता 6.20–23।
अनुवाद: Annie Besant, The Bhagavad Gîtâ, or The Lord's Song (London: Theosophical Publishing Society, 1895), पृष्ठ 69। भगवद्गीता 6.21।
अनुवाद: Swami Swarupananda, Srimad-Bhagavad-Gita (Mayavati: Prabuddha Bharata Press, 1909; first printed in Prabuddha Bharata, 1907–1909), पृष्ठ 131–132। भगवद्गीता 6.20–23।
हमारी व्याख्या: “भगवद्गीता 6.21: अर्थ और अनुवाद”। पूजादीप। अद्यतन 25 अक्टूबर 2026। https://pujadeep.com/hi/bhagavad-gita/6/21/
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शास्त्रीय व्याख्याएँ, संप्रदाय के अनुसार
इस श्लोक पर अभी संप्रदायों की व्याख्या नहीं है।
संस्कृत पाठ: 1922 का मद्रास मुद्रण। अर्थ: पूजादीप के लिए लिखे और जाँचे गए। स्रोत और बदलाव
परिवारों के प्रश्न
गीता 6.21 कौन कहता है?
यह श्लोक कृष्ण कहते हैं, अध्याय 6 (ध्यानयोग) में।
संस्कृत पाठ कहाँ से लिया गया है?
संस्कृत पाठ: 1922 का मद्रास मुद्रण। अर्थ: पूजादीप के लिए लिखे और जाँचे गए। स्रोत देखें
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स्रोत और लाइसेंस
- संस्कृत पाठ
- The Bhagavad-Gita, or The Lord's Song, with the text in Devanagari and an English translation (Annie Besant, G. A. Natesan & Co., Madras, 1922). सार्वजनिक डोमेन (कॉपीराइट-मुक्त)। इन पृष्ठों का संस्कृत पाठ इसी मुद्रण के पृष्ठ-चित्रों से पढ़ा गया है।
- अनुवाद
- The Bhagavadgîtâ with the Sanatsugâtîya and the Anugîtâ, translated by Kâshinâth Trimbak Telang (The Sacred Books of the East, vol. VIII, ed. F. Max Müller) (Kashinath Trimbak Telang, F. Max Müller, Clarendon Press, Oxford, 1882). सार्वजनिक डोमेन (कॉपीराइट-मुक्त)। जैसा छपा है, वैसा ही दिखाया गया।
- अनुवाद
- The Bhagavad Gîtâ, or The Lord's Song, translated by Annie Besant (Annie Besant, Theosophical Publishing Society, London, 1895). सार्वजनिक डोमेन (कॉपीराइट-मुक्त)। जैसा छपा है, वैसा ही दिखाया गया।
- अनुवाद
- Srimad-Bhagavad-Gita, with Sanskrit Text; Paraphrase with Word-by-word Literal Translation; English Rendering and Comments, Index, &c., by the Swami Swarupananda (Himalayan Series, No. XX) (Swami Swarupananda, The Editors and Publishers, Advaita Ashrama, Mayavati, Prabuddha Bharata Press, Mayavati, Almora, Himalayas, 1909). सार्वजनिक डोमेन (कॉपीराइट-मुक्त)। जैसा छपा है, वैसा ही दिखाया गया।
- प्रचलित पाठ
- इस पाठ में 32 शब्द आज के प्रचलित रूप में हैं; इन्हें sanskritdocuments.org; संस्कृत विकिस्रोत; गीता प्रेस, गोरखपुर; ग्रेटिल, गॉटिंगेन और भक्तिवेदांत बुक ट्रस्ट के पाठ से मिलाकर जाँचा गया।
- हमारी व्याख्या
- इस साइट के लिए यहाँ दिए स्रोतों के आधार पर लिखी और उद्धृत संस्करण से मिलाई गई व्याख्या। यह अनुवाद नहीं है, और पाठ को पढ़ने का एकमात्र तरीका भी नहीं है। श्रेय देकर आप इसे उद्धृत कर सकते हैं।
- जाँच
- उद्धृत संस्करण से मिलाया गया, 15 अक्टूबर 2026।
- अद्यतन
- 25 अक्टूबर 2026