श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 4: ज्ञानकर्मसंन्यासयोग का सार और श्लोक

श्रीमद्भगवद्गीता (Bhagavad Gita) अध्याय 4, ज्ञानकर्मसंन्यासयोग। 42 श्लोक।

ज्ञानकर्मसंन्यासयोग

अध्याय 4 का सार

गीता के चौथे अध्याय में कृष्ण बताते हैं कि वे जन्म क्यों लेते हैं, आसक्ति के बिना कर्म क्या है, और ज्ञान-यज्ञ क्या है। वे कहते हैं कि यह पुराना योग उन्होंने सबसे पहले सूर्यदेव विवस्वान को बताया था, और अब अर्जुन को बता रहे हैं (4.1–4.3)। अर्जुन पूछते हैं कि यह कैसे संभव है, जब कृष्ण का जन्म अभी हुआ है। कृष्ण कहते हैं कि दोनों के बहुत-से जन्म हो चुके हैं (4.4–4.5)। उनके अनुसार, जब-जब धर्म की हानि होती है, वे युग-युग में जन्म लेते हैं: सज्जनों की रक्षा, दुष्टों के विनाश और धर्म की स्थापना के लिए (4.7–4.8)। वे कहते हैं कि ज्ञानी कर्म में अकर्म, अकर्म में कर्म देखता है (4.18), और द्रव्य-यज्ञ से ज्ञान-यज्ञ श्रेष्ठ है (4.33)। अंत में वे अर्जुन से ज्ञान की तलवार से संशय काटकर उठने को कहते हैं (4.42)। टीकाकार उनके जन्म और कई श्लोकों को अलग-अलग ढंग से समझाते हैं।

यह सार इस साइट के लिए इस अध्याय के श्लोकों और उनकी हमारी व्याख्या के आधार पर लिखा गया है। यह अनुवाद नहीं है।

श्लोक

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4.1

इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् ।विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ॥

Imam vivasvate yogam proktavanahamavyayamVivasvanmanave praha manurikshvakavebravit

कृष्ण अपने उपदेश का नया भाग आरंभ करते हैं। वे कहते हैं कि यह अविनाशी योग उन्होंने सबसे पहले सूर्यदेव विवस्वान को बताया था। विवस्वान ने इसे मनु (पुरानी कथाओं में मानव जाति के पिता) को बताया, और मनु ने सूर्यवंश के पहले राजा इक्ष्वाकु को।

इस साइट के लिए लिखी और उद्धृत संस्करण से मिलाई गई व्याख्या। श्रेय देकर आप इसे उद्धृत कर सकते हैं।

4.2

एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः ।स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप ॥

Evam paramparapraptamimam rajarshayo viduhSa kaleneha mahata yogo nashtah parantapa

इस तरह परंपरा से चलते हुए यह योग राजर्षियों (जो राजा होकर भी ऋषि थे) ने जाना। पर कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि बहुत समय बीतने पर यह योग संसार से लुप्त हो गया। वे अर्जुन को परंतप (शत्रुओं को तपाने वाले) कहते हैं।

4.3

स एवाऽयं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः ।भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम् ॥

Sa evayam maya tedya yogah proktah puratanahBhaktosi me sakha cheti rahasyam hyetaduttamam

कृष्ण कहते हैं कि वही पुराना योग आज उन्होंने अर्जुन को बताया है, क्योंकि अर्जुन उनके भक्त और मित्र हैं। वे कहते हैं कि यह उत्तम रहस्य है।

4.4

अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः ।कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति ॥

Aparam bhavato janma param janma vivasvatahKathametadvijaniyam tvamadau proktavaniti

अर्जुन एक शंका रखते हैं। कृष्ण का जन्म तो अभी हुआ है, और विवस्वान (सूर्य) का बहुत पहले। तो अर्जुन पूछते हैं कि वे यह कैसे समझें कि कृष्ण ने आरंभ में यह योग बताया था?

4.5

बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन ।तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप ॥

Bahuni me vyatitani janmani tava charjunaTanyaham veda sarvani na tvam vettha parantapa

कृष्ण उत्तर देते हैं कि उनके और अर्जुन के बहुत-से जन्म बीत चुके हैं। वे उन सबको जानते हैं, पर अर्जुन अपने जन्मों को नहीं जानते।

4.6

अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् ।प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया ॥

Ajopi sannavyayatma bhutanamishvaropi sanPrakritim svamadhishthaya sambhavamyatmamayaya

कृष्ण कहते हैं कि वे अजन्मा हैं, उनका स्वरूप कभी नष्ट नहीं होता, और वे सब प्राणियों के ईश्वर हैं। फिर भी वे अपनी प्रकृति को अपने वश में रखकर, अपनी आत्ममाया (अपनी शक्ति) से जन्म लेते हैं। प्राचीन टीकाकार इस जन्म को अलग-अलग ढंग से समझाते हैं।

4.7

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।अभ्युत्थानमधर्मस्य तदाऽऽत्मानं सृजाम्यहम् ॥

Yada yada hi dharmasya glanirbhavati bharataAbhyutthanamadharmasya tadatmanam srijamyaham

कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म बढ़ता है, तब-तब वे स्वयं को प्रकट करते हैं। यह गीता के सबसे प्रसिद्ध श्लोकों में से एक है। बेसेंट की टिप्पणी के अनुसार अधर्म धर्म का उलटा है: जो कुछ अव्यवस्थित है और चीज़ों के स्वभाव के विरुद्ध है।

4.8

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥

Paritranaya sadhunam vinashaya cha dushkritamDharmasansthapanarthaya sambhavami yuge yuge

कृष्ण बताते हैं कि वे क्यों आते हैं: सज्जनों की रक्षा के लिए, बुरे काम करने वालों के विनाश के लिए, और धर्म को दृढ़ता से स्थापित करने के लिए। इसके लिए वे युग-युग में जन्म लेते हैं। श्लोक 7 और 8 मिलकर गीता के अपने शब्दों में बताते हैं कि भगवान अवतार क्यों लेते हैं।

4.9

जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः ।त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ॥

Janma karma cha me divyamevam yo vetti tattvatahTyaktva deham punarjanma naiti mameti sorjuna

कृष्ण कहते हैं कि जो उनके दिव्य जन्म और कर्म को ठीक-ठीक (तत्त्व से) जान लेता है, वह शरीर छोड़ने के बाद फिर जन्म नहीं लेता, बल्कि उन्हीं को प्राप्त होता है।

4.10

वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिताः ।बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः ॥

Vitaragabhayakrodha manmaya mamupashritahBahavo jnanatapasa puta madbhavamagatah

कृष्ण कहते हैं कि पहले भी बहुत लोग ऐसा कर चुके हैं। राग, भय और क्रोध से मुक्त, उन्हीं में लीन और उन्हीं की शरण में रहकर, ज्ञान रूपी तप से पवित्र हुए बहुत-से लोग उनके भाव (स्वरूप) को प्राप्त हुए हैं।

4.11

ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् ।मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥

Ye yatha mam prapadyante tanstathaiva bhajamyahamMama vartmanuvartante manushyah partha sarvashah

कृष्ण कहते हैं कि जो जिस भाव से उनकी ओर आता है, वे उसे उसी भाव से अपनाते हैं। हर तरह से, सब ओर, मनुष्य उन्हीं के मार्ग पर चलते हैं। तेलंग की टिप्पणी के अनुसार इसका अर्थ है कि भगवान पक्षपात नहीं करते: पूजा किसी को भी अर्पित हो, वह उन्हीं तक पहुँचती है।

4.12

काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः ।क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा ॥

Kankshantah karmanam siddhim yajanta iha devatahKshipram hi manushe loke siddhirbhavati karmaja

कृष्ण कहते हैं कि जो लोग अपने कर्मों की सफलता चाहते हैं, वे यहाँ देवताओं की पूजा करते हैं, क्योंकि मनुष्य-लोक में कर्म से मिलने वाली सफलता जल्दी मिलती है।

4.13

चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः ।तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम् ॥

Chaturvarnyam maya srishtam gunakarmavibhagashahTasya kartaramapi mam viddhyakartaramavyayam

कृष्ण कहते हैं कि चार वर्ण (समाज के चार वर्ग) उन्होंने गुण और कर्म के विभाग के अनुसार बनाए हैं। वे उनके रचयिता हैं, फिर भी अर्जुन उन्हें अकर्ता (जो कर्म नहीं करता) और अविनाशी जानें। दोनों पुराने अंग्रेज़ी अनुवाद वर्ण के लिए 'जाति' (कास्ट) शब्द रखते हैं।

4.14

न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा ।इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते ॥

Na mam karmani limpanti na me karmaphale sprihaIti mam yobhijanati karmabhirna sa badhyate

कृष्ण कहते हैं कि कर्म उन्हें लिप्त नहीं करते, और उन्हें कर्म के फल की इच्छा नहीं है। जो उन्हें इस तरह जानता है, वह कर्मों से नहीं बँधता।

4.15

एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः ।कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम् ॥

Evam jnatva kritam karma purvairapi mumukshubhihKuru karmaiva tasmattvam purvaih purvataram kritam

कृष्ण कहते हैं कि यह जानकर पुराने समय के मोक्ष चाहने वाले लोगों ने भी कर्म किया। इसलिए अर्जुन भी वैसे ही कर्म करें, जैसे पूर्वजों ने बहुत पहले किया था।

4.16

किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः ।तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥

Kim karma kimakarmeti kavayopyatra mohitahTatte karma pravakshyami yajjnatva mokshyaseshubhat

कृष्ण कहते हैं कि कर्म क्या है और अकर्म क्या है, इस पर बुद्धिमान लोग भी भ्रम में पड़ जाते हैं। इसलिए वे अर्जुन को कर्म का स्वरूप बताएँगे, जिसे जानकर अर्जुन अशुभ (बंधन) से छूट जाएँगे।

4.17

कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मणः ।अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गतिः ॥

Karmano hyapi boddhavyam boddhavyam cha vikarmanahAkarmanashcha boddhavyam gahana karmano gatih

कृष्ण कहते हैं कि कर्म को समझना चाहिए, विकर्म (निषिद्ध या उलटे कर्म) को भी, और अकर्म को भी, क्योंकि कर्म की गति गहन है।

4.18

कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः ।स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्तः कृत्स्नकर्मकृत् ॥

Karmanyakarma yah pashyedakarmani cha karma yahSa buddhimanmanushyeshu sa yuktah kritsnakarmakrit

कृष्ण कहते हैं कि जो कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म देखता है, वही मनुष्यों में बुद्धिमान है। वह सब कर्म करते हुए भी योग में स्थित (युक्त) रहता है। टीकाकार इस विरोधाभास को अलग-अलग ढंग से समझाते हैं।

4.19

यस्य सर्वे समारम्भाः कामसङ्कल्पवर्जिताः ।ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहुः पण्डितं बुधाः ॥

Yasya sarve samarambhah kamasankalpavarjitahJnanagnidagdhakarmanam tamahuh panditam budhah

कृष्ण कहते हैं कि जिसके सब कार्य कामना और संकल्प से रहित हैं, और जिसके कर्म ज्ञान की आग में जल चुके हैं, उसे ज्ञानी लोग पंडित कहते हैं।

4.20

त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रयः ।कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति सः ॥

Tyaktva karmaphalasangam nityatripto nirashrayahKarmanyabhipravrittopi naiva kinchitkaroti sah

ऐसा व्यक्ति कर्म के फल की आसक्ति छोड़ चुका है, सदा तृप्त है और किसी पर आश्रित नहीं है। कृष्ण कहते हैं कि कर्म में पूरी तरह लगे रहकर भी वह कुछ नहीं करता।

4.21

निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः ।शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥

Nirashiryatachittatma tyaktasarvaparigrahahShariram kevalam karma kurvannapnoti kilbisham

कृष्ण कहते हैं कि जो आशा (लालसा) से रहित है, जिसका मन और शरीर वश में है, और जिसने सब संग्रह (परिग्रह) छोड़ दिया है, वह केवल शरीर के लिए कर्म करते हुए पाप (किल्बिष) को प्राप्त नहीं होता। दोनों अनुवाद 'शारीरं केवलं कर्म' को अलग ढंग से लेते हैं: तेलंग 'शरीर के लिए', बेसेंट 'केवल शरीर से'।

4.22

यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः ।समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वाऽपि न निबध्यते ॥

Yadrichchhalabhasantushto dvandvatito vimatsarahSamah siddhavasiddhau cha kritvapi na nibadhyate

कृष्ण कहते हैं कि जो अपने-आप मिलने वाली चीज़ से संतुष्ट है, सुख-दुःख जैसे द्वंद्वों से ऊपर है, ईर्ष्या से रहित है, और सफलता-असफलता में सम रहता है, वह कर्म करके भी नहीं बँधता।

4.23

गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः ।यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते ॥

Gatasangasya muktasya jnanavasthitachetasahYajnayacharatah karma samagram praviliyate

कृष्ण कहते हैं कि जिसकी आसक्ति मिट गई है, जो मुक्त है, जिसका चित्त ज्ञान में स्थित है, और जो यज्ञ के भाव से कर्म करता है, उसका सारा कर्म विलीन हो जाता है।

4.24

ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् ।ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना ॥

Brahmarpanam brahma havirbrahmagnau brahmana hutamBrahmaiva tena gantavyam brahmakarmasamadhina

अर्पण (आहुति देने का साधन) ब्रह्म है, हवि (आहुति) ब्रह्म है, और ब्रह्म रूपी अग्नि में ब्रह्म द्वारा ही आहुति दी जाती है। जो हर कर्म में ब्रह्म को देखता है, वह ब्रह्म को ही प्राप्त होता है। अलग-अलग परंपराएँ इस श्लोक को अपने ढंग से समझाती हैं। पूजादीप इस श्लोक को भोजन से पहले की प्रार्थनाओं में भी रखता है (ब्रह्मार्पणम्)।

4.25

दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते ।ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति ॥

Daivamevapare yajnam yoginah paryupasateBrahmagnavapare yajnam yajnenaivopajuhvati

अब कृष्ण यज्ञ के कई प्रकार बताते हैं। कुछ योगी देवताओं के लिए यज्ञ करते हैं। दूसरे ब्रह्म रूपी अग्नि में यज्ञ के द्वारा ही यज्ञ की आहुति देते हैं।

4.26

श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति ।शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति ॥

Shrotradinindriyanyanye sanyamagnishu juhvatiShabdadinvishayananya indriyagnishu juhvati

कुछ लोग श्रोत्र (सुनने की शक्ति) आदि इंद्रियों को संयम रूपी अग्नि में होम करते हैं। दूसरे शब्द आदि विषयों को इंद्रिय रूपी अग्नि में होम करते हैं।

4.27

सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे ।आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते ॥

Sarvanindriyakarmani pranakarmani chapareAtmasanyamayogagnau juhvati jnanadipite

दूसरे सब इंद्रियों के कर्मों और प्राणों के कर्मों को ज्ञान से जलाई गई आत्मसंयम रूपी योग-अग्नि में होम करते हैं।

4.28

द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथाऽपरे ।स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः ॥

Dravyayajnastapoyajna yogayajnastathapareSvadhyayajnanayajnashcha yatayah sanshitavratah

कुछ लोग द्रव्य (धन-सामग्री) का यज्ञ करते हैं, कुछ तप का, कुछ योग का। कठोर व्रत वाले दूसरे यत्नशील लोग स्वाध्याय (शास्त्रों का अध्ययन) और ज्ञान का यज्ञ करते हैं।

4.29

अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथाऽपरे ।प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः ॥

Apane juhvati pranam pranepanam tathaparePranapanagati ruddhva pranayamaparayanah

दूसरे, जो प्राणायाम में लगे हैं, अपान में प्राण का और प्राण में अपान का होम करते हैं, और दोनों की गति को रोकते हैं। तेलंग प्राण को ऊपर जाने वाली और अपान को नीचे जाने वाली श्वास कहते हैं; बेसेंट इन्हें बाहर जाने वाली और भीतर आने वाली श्वास कहती हैं।

4.30

अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति ।सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः ॥

Apare niyataharah prananpraneshu juhvatiSarvepyete yajnavido yajnakshapitakalmashah

दूसरे, जो नियमित और सीमित आहार लेते हैं, प्राणों को प्राणों में होम करते हैं। कृष्ण कहते हैं कि ये सब यज्ञ को जानने वाले हैं, और यज्ञ से इनके पाप धुल गए हैं।

4.31

यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम् ।नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम ॥

Yajnashishtamritabhujo yanti brahma sanatanamNayam lokostyayajnasya kutonyah kurusattama

कृष्ण कहते हैं कि जो यज्ञ से बचे हुए अमृत जैसे अन्न को खाते हैं, वे सनातन ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। वे जोड़ते हैं कि जो यज्ञ नहीं करता, उसके लिए यह लोक भी नहीं है, फिर दूसरा लोक कैसे होगा?

4.32

एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे ।कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे ॥

Evam bahuvidha yajna vitata brahmano mukheKarmajanviddhi tansarvanevam jnatva vimokshyase

इस तरह बहुत-से यज्ञ 'ब्रह्म के मुख में' फैले हुए हैं: तेलंग इसका अर्थ 'वेदों में' लेते हैं, बेसेंट 'ब्रह्म के सामने'। कृष्ण कहते हैं कि अर्जुन जानें कि ये सब कर्म से उत्पन्न होते हैं, और यह जानकर वे मुक्त हो जाएँगे।

4.33

श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप ।सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते ॥

Shreyandravyamayadyajnajjnanayajnah parantapaSarvam karmakhilam partha jnane parisamapyate

कृष्ण कहते हैं कि द्रव्य से होने वाले यज्ञ से ज्ञान-यज्ञ श्रेष्ठ है, क्योंकि सारे कर्म ज्ञान में ही पूरे होते हैं।

4.34

तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया ।उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥

Tadviddhi pranipatena pariprashnena sevayaUpadekshyanti te jnanam jnaninastattvadarshinah

कृष्ण अर्जुन को बताते हैं कि यह ज्ञान कैसे मिलता है: आदर से प्रणाम करके, सच्चे मन से प्रश्न पूछकर, और सेवा से। तत्त्व को देखने वाले ज्ञानी यह ज्ञान सिखाएँगे। यहाँ गीता शिष्य और गुरु के संबंध का वर्णन करती है।

4.35

यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव ।येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि ॥

Yajjnatva na punarmohamevam yasyasi pandavaYena bhutanyasheshena drakshyasyatmanyatho mayi

कृष्ण कहते हैं कि यह जानकर अर्जुन फिर ऐसे मोह में नहीं पड़ेंगे। इसके द्वारा वे सब प्राणियों को, बिना किसी अपवाद के, अपने आत्मा में और फिर कृष्ण में देखेंगे।

4.36

अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः ।सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि ॥

Api chedasi papebhyah sarvebhyah papakrittamahSarvam jnanaplavenaiva vrijinam santarishyasi

कृष्ण कहते हैं कि यदि अर्जुन सब पापियों से भी अधिक पाप करने वाले हों, तब भी वे ज्ञान रूपी नाव से सब पापों को पार कर जाएँगे।

4.37

यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन ।ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा ॥

Yathaidhansi samiddhognirbhasmasatkuruterjunaJnanagnih sarvakarmani bhasmasatkurute tatha

कृष्ण कहते हैं कि जैसे जलती हुई आग लकड़ियों को राख कर देती है, वैसे ही ज्ञान रूपी अग्नि सब कर्मों को राख कर देती है।

4.38

न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते ।तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति ॥

Na hi jnanena sadrisham pavitramiha vidyateTatsvayam yogasansiddhah kalenatmani vindati

कृष्ण कहते हैं कि इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला कुछ नहीं है। योग में सिद्ध हुआ व्यक्ति समय आने पर उसे अपने भीतर, अपने आत्मा में, पा लेता है।

4.39

श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः ।ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ॥

Shraddhavanllabhate jnanam tatparah sanyatendriyahJnanam labdhva param shantimachirenadhigachchhati

कृष्ण कहते हैं कि जिसमें श्रद्धा है, जो लक्ष्य में लगा है और जिसकी इंद्रियाँ वश में हैं, वह ज्ञान पाता है। ज्ञान पाकर वह जल्दी ही परम शांति को प्राप्त होता है।

4.40

अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति ।नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः ॥

Ajnashchashraddadhanashcha sanshayatma vinashyatiNayam lokosti na paro na sukham sanshayatmanah

कृष्ण कहते हैं कि जो ज्ञान और श्रद्धा से रहित है और जिसका मन संशय से भरा है, उसका पतन होता है: ऐसे मन के लिए न इस लोक में सुख है, न परलोक में। श्लोक का शब्द है संशयात्मा, यानी जिसका पूरा मन ही संशय बन गया हो (तेलंग: 'जिसका मन शंकाओं से भरा है')। श्लोक 34 में कृष्ण ने स्वयं अर्जुन से ज्ञानियों से प्रश्न पूछने को कहा है, इसलिए यह श्लोक सच्चे प्रश्नों के विरुद्ध नहीं है।

4.41

योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसञ्छिन्नसंशयम् ।आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय ॥

Yogasannyastakarmanam jnanasanchhinnasanshayamAtmavantam na karmani nibadhnanti dhananjaya

कृष्ण अर्जुन (धनंजय) से कहते हैं कि जिसने योग के द्वारा कर्मों का संन्यास किया है, जिसके संशय ज्ञान से कट गए हैं, और जो आत्मवान है, उसे कर्म नहीं बाँधते। दोनों अनुवादकों की टिप्पणियाँ आत्मवान का अर्थ सजग और प्रमाद से रहित बताती हैं।

4.42

तस्मादज्ञानसम्भूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनाऽऽत्मनः ।छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत ॥

Tasmadajnanasambhutam hritstham jnanasinatmanahChhittvainam sanshayam yogamatishthottishtha bharata

इसलिए कृष्ण कहते हैं कि अर्जुन अज्ञान से जन्मे, हृदय में बसे इस संशय को ज्ञान की तलवार से काटकर योग में स्थित हों और उठ खड़े हों। अध्याय उसी पुकार पर समाप्त होता है जो कृष्ण ने अध्याय 2 (श्लोक 3) में दी थी: खड़े हो जाओ।

याद करें: श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 4

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स्रोत और लाइसेंस

संस्कृत पाठ
The Bhagavad-Gita, or The Lord's Song, with the text in Devanagari and an English translation (Annie Besant, G. A. Natesan & Co., Madras, 1922). सार्वजनिक डोमेन (कॉपीराइट-मुक्त)। इन पृष्ठों का संस्कृत पाठ इसी मुद्रण के पृष्ठ-चित्रों से पढ़ा गया है।
अनुवाद
The Bhagavadgîtâ with the Sanatsugâtîya and the Anugîtâ, translated by Kâshinâth Trimbak Telang (The Sacred Books of the East, vol. VIII, ed. F. Max Müller) (Kashinath Trimbak Telang, F. Max Müller, Clarendon Press, Oxford, 1882). सार्वजनिक डोमेन (कॉपीराइट-मुक्त)। जैसा छपा है, वैसा ही दिखाया गया।
अनुवाद
The Bhagavad Gîtâ, or The Lord's Song, translated by Annie Besant (Annie Besant, Theosophical Publishing Society, London, 1895). सार्वजनिक डोमेन (कॉपीराइट-मुक्त)। जैसा छपा है, वैसा ही दिखाया गया।
साक्षी संस्करण (पाठ के समय का प्रमाण)
Srimad-Bhagavad-Gita, with Sanskrit Text; Paraphrase with Word-by-word Literal Translation; English Rendering and Comments, Index, &c., by the Swami Swarupananda (Himalayan Series, No. XX) (Swami Swarupananda, The Editors and Publishers, Advaita Ashrama, Mayavati, Prabuddha Bharata Press, Mayavati, Almora, Himalayas, 1909). सार्वजनिक डोमेन (कॉपीराइट-मुक्त)। केवल यह दिखाने के लिए कि पाठ कितना पुराना है। इस पृष्ठ का देवनागरी पाठ एक पठन-पाठ है, इस मुद्रण से नहीं लिया गया।
प्रचलित पाठ
इस पाठ में 32 शब्द आज के प्रचलित रूप में हैं; इन्हें sanskritdocuments.org; संस्कृत विकिस्रोत; गीता प्रेस, गोरखपुर; ग्रेटिल, गॉटिंगेन और भक्तिवेदांत बुक ट्रस्ट के पाठ से मिलाकर जाँचा गया।
हमारी व्याख्या
इस साइट के लिए यहाँ दिए स्रोतों के आधार पर लिखी और उद्धृत संस्करण से मिलाई गई व्याख्या। यह अनुवाद नहीं है, और पाठ को पढ़ने का एकमात्र तरीका भी नहीं है। श्रेय देकर आप इसे उद्धृत कर सकते हैं।
जाँच
उद्धृत संस्करण से मिलाया गया, 15 अक्टूबर 2026।
अद्यतन
27 अक्टूबर 2026

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